अहमदाबाद | महानगर मेट्रो एक्सक्लूसिव
जब पूरा शहर सोता है, तब कुछ आंखें ऐसी होती हैं जो पिछले 10 महीनों से मींची नहीं गई हैं। ये वो आंखें हैं जिन्होंने अहमदाबाद के आसमान में अपने चहेतों को आग की लपटों में विलीन होते देखा था। हादसा होता है, जांच बैठती है और फिर फाइलें धूल खाने लगती हैं—क्या यही हमारी व्यवस्था की नियति है? आज ‘महानगर मेट्रो’ उन परिवारों के दिल की तड़प को आवाज दे रहा है, जिन्होंने सरकार से मुआवजा नहीं, बल्कि ‘सच’ मांगा है।
हमें दौलत नहीं, सच की दरकार है!
हादसे के दस महीने बीत जाने के बाद भी पीड़ित परिवार आज भी अंधेरे में हैं। हाल ही में इन परिवारों ने सीधे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में कोई नफरत नहीं, कोई राजनीति नहीं, बल्कि एक ऐसी बेबसी है जो पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर दे। परिवारों ने साफ लफ्जों में कहा है: “हमें करोड़ों का मुआवजा नहीं चाहिए, वो पैसा हमारे अपनों को वापस नहीं ला सकता। हमें बस ये जानना है कि उन आखिरी लम्हों में आखिर हुआ क्या था?”
ब्लैक बॉक्स का रहस्य कब खुलेगा?
जांच रिपोर्ट के नाम पर अब तक सिर्फ आश्वासन की घुट्टी पिलाई गई है, लेकिन हकीकत क्या है? परिजनों ने सीधे सवाल दागे हैं कि:
ब्लैक बॉक्स* और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) का डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
अगर सुरक्षा कारणों से डेटा जगजाहिर नहीं किया जा सकता, तो कम से कम पीड़ित परिवारों को बंद कमरे में तो सच बताइए!
वो कौन सी तकनीकी खामी या मानवीय चूक थी, जिसने एक झटके में 260 हंसती-खेलती जिंदगियों को राख के ढेर में बदल दिया?
यह सिर्फ जांच नहीं, जज्बाती इंसाफ है
सरकारी फाइलों में यह शायद सिर्फ ‘एयर इंडिया विमान हादसा’ का एक नंबर होगा, लेकिन उन परिवारों के लिए यह रूह का जख्म है। सच जानना हर नागरिक का हक है, खासकर उनका जिन्होंने अपना सब कुछ गंवा दिया। क्या सिस्टम के पास इतनी संवेदनशीलता बची है कि वह इन बिलखते परिवारों को जवाब दे सके?
महानगर मेट्रो का सवाल
आखिर क्यों अब तक जांच रिपोर्ट के नतीजों को दबाया जा रहा है? क्या सच इतना खौफनाक है कि उसे बाहर लाने से सत्ता के गलियारे डर रहे हैं? प्रधानमंत्री तक पहुंचा यह ‘न्याय पत्र’ क्या इंसाफ दिला पाएगा या फिर ‘जांच जारी है’ के खोखले वादे के नीचे इस सच को भी दफन कर दिया जाएगा?
पैनी और बेबाक कलम से:
(Pawan Makan
ग्रुप एडिटर – महानगर मेट्रो

