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देह भस्म, आत्मा अमर: अंतिम संस्कार के पीछे का शाश्वत धार्मिक और वैज्ञानिक सत्य

धन वारिसों को मिलता है, शरीर अग्नि को मिलता है, परंतु कर्म आत्मा के साथ चलते हैं।

मृत्यु जीवन का सबसे अटल, अंतिम और पवित्र सत्य है। “जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है” — यह इस सृष्टि का अनादि और शाश्वत नियम है। मनुष्य जन्म लेता है, जीवन जीता है, रिश्ते बनाता है, कर्म करता है और एक दिन देह त्याग देता है। परंतु मृत्यु के पश्चात शरीर को अग्निदाह देकर या अन्य
धार्मिक विधि से विलीन क्यों किया जाता है? क्या यह केवल एक रूढ़िवादी परंपरा या सामाजिक क्रिया है?

नहीं, सनातन धर्म, भगवद्गीता, उपनिषदों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार यह प्रक्रिया केवल भौतिक देह का निपटान नहीं है, बल्कि आत्मा की परम मुक्ति, पंचमहाभूतों से ऋणमुक्ति और प्रकृति के शाश्वत चक्र में पुनः विलीनीकरण का गूढ़ आध्यात्मिक संस्कार है।

भारतीय संस्कृति में मनुष्य जीवन को १६ पवित्र संस्कारों में विभाजित किया गया है। प्रथम संस्कार ‘गर्भाधान’ से शुरू होने वाली इस जीवन-यात्रा का अंतिम अध्याय यानी अंत्येष्टि संस्कार।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अग्नि-संस्कार किसी देह को जलाने की साधारण क्रिया नहीं है, बल्कि परमात्मा द्वारा दिए गए इस देह को अंत में पवित्र अग्निदेव के माध्यम से ईश्वर के चरणों में समर्पित की जाने वाली अंतिम आहुति (यज्ञ) है।

ऋणमुक्ति: इस विधि द्वारा मनुष्य अपने भौतिक अस्तित्व के सभी आडंबरों और सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम चैतन्य के साथ एकाकार हो जाता है।
हमारा भौतिक शरीर पांच तत्वों से बना है: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। शास्त्र और विज्ञान दोनों कहते हैं कि जो तत्व जहाँ से लिया गया है, उसे पूर्ण आदर के साथ वहीं लौटा देना ही प्राकृतिक न्याय है।

अग्नि: शरीर का दाह संस्कार होते ही शरीर का तापमान और ऊर्जा अग्नि तत्व में मिल जाती है।
वायु और आकाश: प्राणवायु और धुआं वायु तथा अनंत आकाश में विलीन हो जाते हैं।
जल और पृथ्वी: अस्थि और भस्म को पवित्र नदियों में प्रवाहित करने से तथा मिट्टी में मिलने से जल और पृथ्वी तत्व अपना मूल स्वरूप पुनः प्राप्त कर लेते हैं।

यह प्रक्रिया दर्शाती है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि प्रकृति का ही एक अविभाज्य अंग है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मृत्यु के बाद जीव का देह-मोह तोड़ने के लिए अंतिम संस्कार आवश्यक है।

महाभारत में यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा था: “दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?”

युधिष्ठिर ने अद्भुत और गहन उत्तर दिया:

“प्रतिदिन हमारी आंखों के सामने असंख्य लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं, फिर भी जीवित हर मनुष्य यही मानता है कि मैं कभी नहीं मरूंगा — यही संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है।”

श्मशान की भस्म हमें इस सत्य का भान कराती है कि रूप, रंग, पद, संपत्ति और अहंकार सब कुछ यहीं रह जाने वाला है।

अंतिम संस्कार के मुख्य चरण और उनका महत्व:

अंतिम संस्कार मृतक के प्रति आदर और परिवार के लिए शोकमुक्ति की एक मानसिक (psychological) और सामाजिक प्रक्रिया भी है।

पवित्रता और सम्मान: मृतक को स्वच्छ करके नए वस्त्र, तुलसी और चंदन अर्पित करना यह दर्शाता है कि जीवन का अंत भी गौरव और सम्मान के साथ होना चाहिए।

अंतिम दर्शन और शवयात्रा: स्नेहीजनों को अंतिम विदाई देने का अवसर मिलता है और समाज को इस सत्य का स्वीकार होता है कि हम सभी को एक दिन इसी मार्ग पर जाना है।

अग्निदाह और अस्थि विसर्जन: देह को पूर्णतः प्रकृति को समर्पित करके आत्मा को सांसारिक मोह से मुक्त करने की प्रक्रिया है।

सामाजिक और स्वास्थ्य विज्ञान: वैज्ञानिक दृष्टि से भी मृतदेह का सही समय और सही तरीके से संस्कार करने से वातावरण की स्वच्छता बनी रहती है और आसपास के लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

मृत्यु केवल शोक या डर का विषय नहीं है, बल्कि जीवन की सही सार्थकता को समझने का अवसर है

जीवित संबंधों का मूल्य: जो व्यक्ति आज हमारे साथ है, उसे जीते जी प्रेम और आदर दें। मृत्यु के बाद अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देने की तुलना में जीते जी संबंधों की कद्र करना ही सच्चा धर्म है।

अंत्येष्टि संस्कार केवल एक धार्मिक विधि या शोक व्यक्त करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य जीवन के सबसे बड़े और शाश्वत सत्य की अनुभूति है। यह संस्कार हमें याद दिलाता है कि इस जग में कुछ भी स्थायी नहीं है; हमारा यह सुंदर शरीर, पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति और वैभव सब कुछ क्षणभंगुर है।

यह प्रक्रिया हमें निराशा की ओर नहीं ले जाती, बल्कि जीवन जीने की सही दिशा दिखाती है। जिस क्षण हमें यह सत्य समझ आ जाता है कि ‘मैं यह भौतिक देह नहीं, बल्कि अमर आत्मा हूँ’, उसी क्षण जीवन से मृत्यु का भय गायब हो जाता है और सत्कर्मों का सच्चा प्रारंभ होता है। हमारा देह भले ही भस्म हो जाए, लेकिन हमारी मानवता, स्नेह और सत्कर्मों की सुवास इस संसार में सदा के लिए अमर रहनी चाहिए — यही अंतिम संस्कार का सच्चा धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश है।

जन्म एक अवसर है, जीवन एक जिम्मेदारी है, मृत्यु एक परिवर्तन है और आत्मा सदा अविनाशी है।

दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर

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