तेल की एक बूंद के लिए तरस रहे आम लोगों के बीच करोड़ों रुपये के दीये जलाकर जश्न मनाना: क्या यह जनता के कर के पैसे का गलत इस्तेमाल नहीं है?
जिस देश में आज आम नागरिक महंगाई के असहनीय बोझ से दबा हुआ है, जहां गरीब और मध्यम वर्ग परिवार अपनी रसोई चलाने के लिए तेल की एक-एक बूंद बचाने को मजबूर हैं, उसी देश में हुक्मरान अपनी शान-शौकत के लिए करोड़ों रुपये का तेल दीयों में जला रहे हैं। अब देश के कई हिस्सों से हुक्मरानों के इन बड़े और घमंडी कार्यक्रमों के खिलाफ तीखे विरोध और गुस्से की आवाजें उठ रही हैं।
गरीबों की थाली खाली है, और राजनीतिक त्योहारों पर अरबों खर्च हो रहे हैं
दिवाली या दूसरे खास मौकों के साथ-साथ नेताओं के जन्मदिन या सरकारी त्योहारों पर भी अरबों रुपये खर्च करके लाखों दीये जलाकर रिकॉर्ड बनाने की होड़ मची हुई है। लेकिन इस प्रदर्शन के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि आज देश का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण, गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा है। एक तरफ देश का गरीब नागरिक पेट पर पट्टी बांधकर राशन की दुकानों या बाजारों से महंगा सरसों या खाने का तेल खरीदता है। दूसरी तरफ, जनता के कर के पैसे से खरीदा गया करोड़ों लीटर तेल सिर्फ कुछ पल के फोटो-सेशन और तालियों के लिए जमीन पर जला दिया जाता है।
खुद पर तरस या जनता का मजाक?
नागरिक और जागरूक विचारक अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि जिस देश में लाखों बच्चों को पौष्टिक खाना नहीं मिलता, जहां हजारों लोग रात को भूखे सोने को मजबूर हैं, वहां ऐसे बड़े-बड़े और आलीशान योजनाएं क्यों? लोकतंत्र में राजा या शासक का पहला कर्तव्य जनता की भलाई होना चाहिए, न कि अपनी निजी शान-शौकत और लोकप्रियता के लिए सरकारी खजाने को बर्बाद करना। ऐसे प्रदर्शनों को स्थानीय जनता और विपक्षी दल ‘खुद पर तरस खाने वाली तानाशाही’ का उत्कृष्ट उदाहरण बता रहे हैं। अगर लोगों के कर के इस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब कल्याण योजनाओं पर किया जाता, तो देश के लाखों गरीब परिवारों का जीवन स्तर सुधर सकता था। लेकिन जनकल्याण को किनारे रखकर “रिकॉर्ड” बनाने की इस दौड़ में, देश का आम नागरिक आज भी अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए तरस रहा है।

