धर्म की आड़ में साम्राज्य खड़ा करने और खुद को भगवान का दर्जा देने वाले तथाकथित संतों का इतिहास अक्सर अंधविश्वास, शोषण और हिंसा के काले पन्नों से रंगा रहा है। हरियाणा के हिसार जिले के बरवाला कस्बे में स्थित सतलोक आश्रम और इसके संचालक संत रामपाल (रामपाल दास) का प्रकरण इसका सबसे भयानक उदाहरण है। किस तरह एक साधारण सरकारी कर्मचारी ने आम जनता की आस्था से खिलवाड़ करते हुए एक समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश की और अंततः कानून के शिकंजे में कैद हो गया, यह कहानी समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
साधारण इंजीनियर से पाखंड के सिंहासन तक
रामपाल मूल रूप से हरियाणा के सोनीपत जिले का रहने वाला था और हरियाणा सरकार के सिंचाई विभाग में कनिष्ठ अभियंता (Junior Engineer) के पद पर कार्यरत था। नौकरी के दौरान ही उसका झुकाव आध्यात्मिक बहसों और कबीर पंथ की तरफ हुआ। धीरे-धीरे उसने अपनी नौकरी छोड़कर खुद को एक आध्यात्मिक प्रचारक और संत के रूप में पेश करना शुरू किया।
देखते ही देखते उसके अनुयायियों का दायरा बढ़ता गया और हिसार के बरवाला में उसने लगभग 20 एकड़ भूमि पर एक विशाल ‘सतलोक आश्रम’ खड़ा कर लिया। लेकिन इस भव्यता के पीछे धीरे-धीरे उन प्रवृत्तियों ने जन्म लेना शुरू किया, जो समाज के लिए घातक साबित होने वाली थीं।
करौंथा हिंसा से हुई थी शुरुआत
संत रामपाल और उसके संगठन के विवादों का लंबा इतिहास है। इसकी शुरुआत वर्ष 2006 में रोहतक जिले के करौंथा स्थित आश्रम से हुई थी। रामपाल ने आर्य समाज के मुख्य ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की कुछ मान्यताओं और टिप्पणियों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हुए तीखा विरोध शुरू किया, जिससे आर्य समाज के लोग उसके कट्टर विरोधी बन गए।
जुलाई 2006 में रोहतक के करौंथा आश्रम के बाहर रामपाल के समर्थकों और आर्य समाज के अनुयायियों के बीच भीषण खूनी झड़प हो गई। इस हिंसक टकराव में एक व्यक्ति की जान चली गई। इस मामले में रामपाल पर हत्या, बलवा फैलाने और दंगे भड़काने का संगीन मामला दर्ज किया गया। उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जहां वह करीब 21 महीने तक बंद रहा और 2008 में जमानत पर रिहा हुआ। हालांकि, अदालती प्रक्रियाओं और साक्ष्यों के अभाव के चलते वर्ष 2022 में रोहतक कोर्ट ने उसे इस पुराने मामले से बरी कर दिया, लेकिन यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि यह आश्रम हिंसा का अड्डा बनता जा रहा है।
नवंबर 2014: बरवाला आश्रम बना युद्ध का मैदान
करौंथा मामले की सुनवाई के दौरान जब अदालत ने रामपाल को पेश होने के निर्देश दिए, तो वह लगातार कानून से आंखें चुराता रहा। वह महीनों तक अदालत में पेश नहीं हुआ। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस गंभीर रुख को अपनाते हुए रामपाल के खिलाफ गैर-जमानती वारंट और सख्त गिरफ्तारी के आदेश जारी किए।
जब हरियाणा पुलिस और प्रशासनिक अमला नवंबर 2014 में रामपाल को गिरफ्तार करने के लिए हिसार के बरवाला स्थित सतलोक आश्रम पहुंचा, तो वहां का नजारा किसी युद्ध के मैदान जैसा था। रामपाल के हजारों कट्टर और उग्र समर्थकों ने आश्रम के चारों ओर एक मजबूत मानवीय ढाल और सुरक्षा घेरा बना लिया था। प्रशासन के खिलाफ खुलेआम बगावत का ऐलान कर दिया गया था।
हफ्तों तक चले इस गतिरोध के दौरान आश्रम के भीतर से कानून व्यवस्था को चुनौती देने के लिए हरसंभव नापाक तरीका अपनाया गया। पुलिस दल पर पेट्रोल बम फेंके गए, एसिड की थैलियां बरसाई गईं और अंधाधुंध पथराव किया गया। सबसे शर्मनाक और अमानवीय पहलू यह था कि आश्रम के भीतर बैठे प्रबंधकों और समर्थकों ने महिलाओं, बुजुर्गों और मासूम बच्चों को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल किया ताकि पुलिस अंदर न घुस सके। स्थिति की नजाकत को देखते हुए प्रशासन ने आश्रम की बिजली और पानी की आपूर्ति पूरी तरह ठप कर दी। लगभग 10 से 12 दिनों तक चले इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के दौरान करोड़ों रुपये का सरकारी और प्रशासनिक संसाधन खर्च हुआ।
संदिग्ध मौतें और खौफनाक सच
इस पूरे ऑपरेशन के अंत में जब पुलिस ने आश्रम के भीतर प्रवेश किया, तो वहां का दृश्य रूह कंपा देने वाला था। प्रशासनिक जांच और तलाशी के दौरान आश्रम के अंदर से 4 महिलाओं और 1 डेढ़ साल के मासूम बच्चे सहित कुल 6 लोगों के शव अत्यंत संदिग्ध और रहस्यमय परिस्थितियों में बरामद हुए। यह स्पष्ट हो गया कि तथाकथित भगवान के घर में किस तरह अंधभक्ति के नाम पर लोगों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा था।
19 नवंबर 2014 की रात को आखिरकार पुलिस ने आश्रम के अंदर से रामपाल को धर दबोचा। उसकी गिरफ्तारी के साथ ही उसके बनाए गए उस कथित आध्यात्मिक साम्राज्य का पर्दाफाश हो गया, जो कानून से ऊपर खुद को समझता था।
आजीवन कारावास और न्याय की जीत
गिरफ्तारी के बाद रामपाल और उसके कई करीबी सहयोगियों पर हत्या, देशद्रोह (Sedition), आपराधिक षड्यंत्र रचने और आम नागरिकों को बंधक बनाकर रखने जैसे अनगिनत गंभीर मुकदमे दर्ज किए गए।
अक्टूबर 2018 में हिसार की एक विशेष अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए 2014 की हिंसक वारदातों और आश्रम से मिले शवों के मामलों में रामपाल और उसके कई अनुयायियों को दोषी करार दिया और उन्हें आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई। इसके अलावा अन्य मुकदमों में भी उसे अलग-अलग सजाएं भुगतनी पड़ रही हैं। हालांकि कानूनी प्रक्रियाओं, लंबी जेल अवधि और उम्र के आधार पर बचाव पक्ष की तरफ से कुछ मामलों में राहत के प्रयास किए जाते रहे हैं, लेकिन उसका आपराधिक रिकॉर्ड और जेल की सलाखों के पीछे पहुंचना यह साबित करता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं।
समाज के नाम संदेश: पाखंडियों से सतर्क रहें
संत रामपाल और बरवाला आश्रम का यह काला इतिहास समाज के लिए एक बड़ा सबक है। आज के समय में ढोंगी और पाखंडी बाबा धर्म, आस्था और सेवा के मुखौटे के पीछे छिपकर अपने निजी साम्राज्य, धन और अवैध गतिविधियों का जाल बुनते हैं। वे सीधे-साधे और भोले-भाले लोगों की भावनाओं से खेलते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें कानून के खिलाफ ढाल बनाते हैं।
महानगर मेट्रो की यह पड़ताल समाज से अपील करती है कि ऐसे किसी भी पाखंडी, अंधविश्वास फैलाने वाले तत्वों और कानून को चुनौती देने वाले संगठनों से पूरी तरह सतर्क रहें। तर्कशीलता, शिक्षा और कानून का सम्मान ही किसी भी स्वस्थ समाज की असली ताकत है।

