मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले में प्रशासनिक लापरवाही की बड़ी तस्वीर सामने आई है। करंजिया विकासखंड के टफिया टोला में तुड़ार नदी पर स्टॉप डेम निर्माण के लिए दो बार भूमि पूजन हुआ, लेकिन 5 साल बाद भी काम शुरू नहीं हुआ। स्थिति यह है कि छोटे बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर रोजाना नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं।
डिंडौरी: जिले के करंजिया विकासखंड की ग्राम पंचायत सेनगुड़ा के पोषक ग्राम टफिया टोला में सरकारी तंत्र की अनदेखी किस कदर हावी है, इसकी बानोगी यहां साफ देखी जा सकती है। तुड़ार नदी पर काजवे कम स्टॉप डेम बनाने के लिए प्रशासन द्वारा वर्ष 2021 और फिर वर्ष 2023 में दो-दो बार भव्य भूमि पूजन किया गया, लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी धरातल पर एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी।
कागजों में दौड़ती फाइलें और मौके पर शून्य काम
शुरुआत में इस महत्वपूर्ण स्टॉप डेम के निर्माण की जिम्मेदारी ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) विभाग को सौंपी गई थी। इसके बाद लागत राशि कम होने का हवाला देते हुए लगभग 72 लाख रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति के साथ इस प्रोजेक्ट को जल संसाधन विभाग को ट्रांसफर कर दिया गया।
करोड़ों के बजट और दो बार शिलान्यास होने के बावजूद आज भी मौके पर सन्नाटा पसरा हुआ है। निर्माण कार्य की शुरुआत न होना सीधे तौर पर जिम्मेदार विभागों और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं मासूम बच्चे
इस स्टॉप डेम के निर्माण में हो रही देरी का सबसे बड़ा और खतरनाक खामियाजा वहां के स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। सेनगुड़ा हाईस्कूल में पढ़ने वाले करीब 50 छोटे-छोटे बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए इसी खतरनाक नदी मार्ग से गुजरने को विवश हैं।
बरसात के दिनों में जब तुड़ार नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, तो बच्चों के लिए स्कूल जाना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं रहता। मजबूरन परिजनों को पहले अपने बच्चों के बस्ते और किताबें नदी के दूसरी तरफ फेंकनी पड़ती हैं, और फिर छोटे बच्चों को अपने कंधों पर बैठाकर तेज बहाव के बीच नदी पार करानी पड़ती है।
डिंडोरी के टफिया टोला में 5 साल बाद भी नहीं बन पाया स्टॉप डेम।
वर्ष 2021 और 2023 में दो1 बार हो चुका है भव्य भूमि पूजन।
करीब 72 लाख रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद भी काम ठप।
सेनगुड़ा हाईस्कूल के 50 से अधिक बच्चे रोजाना जान जोखिम में डालते हैं।
गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाना भी बड़ी चुनौती बना।
आपात स्थिति में और भी गंभीर हो जाती है समस्याएं
ग्रामीणों का कहना है कि नदी पार करने का यही एकमात्र मुख्य रास्ता है। ऐसी स्थिति में यदि गांव में कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो जाए या किसी गर्भवती महिला को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की जरूरत आन पड़े, तो यह सफर जिंदगी और मौत का सवाल बन जाता है।
तेज बारिश के मौसम में नदी का बहाव तेज होने पर ग्रामीणों को घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। कई बार आपातकालीन स्थिति में यह इंतजार बहुत भारी पड़ जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब दो बार भूमि पूजन हुआ था तब लगा था कि उनकी पीढ़ियों पुरानी समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, लेकिन वादे खोखले साबित हुए।

