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मोबाइल नहीं, लापरवाह परवरिश सबसे बड़ा खतरा: डिजिटल दौर में सजगता ही सुरक्षा

भीनमाल (मुकेश सोलंकी) । नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही स्कूल-कॉलेजों के परिसरों में चहल-पहल और रौनक लौट आई है। लेकिन इस नई शुरुआत के साथ एक कड़वी और चिंताजनक सच्चाई भी सामने खड़ी है- आज के दौर में बच्चों के हाथों में किताब से पहले स्मार्टफोन दिखाई देता है। पढ़ाई, ऑनलाइन क्लास और डिजिटल नोट्स के नाम पर बच्चों को दिया गया मोबाइल कब मनोरंजन, खतरनाक गेमिंग, सोशल मीडिया की भुलभुलैया और गलत संगत का जरिया बन जाता है, इसका अंदाजा माता-पिता को तब होता है जब काफी देर हो चुकी होती है।

आज सबसे बड़ा सवाल खुद तकनीक या मोबाइल का नहीं, बल्कि अभिभावकों की जिम्मेदारी और डिजिटल अनुशासन का है। माता-पिता को खुद से कुछ बुनियादी सवाल पूछने होंगे – क्या वे जानते हैं कि उनका बच्चा मोबाइल पर किससे घंटों बात करता है? वह कौन-से ऑनलाइन गेम खेल रहा है और इंटरनेट पर क्या सर्च कर रहा है? सोशल मीडिया पर उसकी संगति किन अजनबी लोगों के साथ है? यदि अभिभावकों के पास इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं हैं, तो यह महज एक अनजाने में हुई चूक नहीं, बल्कि बच्चे के सुनहरे भविष्य के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है ।

हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ छात्र-छात्राएं घर से तो स्कूल या कॉलेज जाने का कहकर निकलते हैं, लेकिन कक्षा तक पहुँचते ही नहीं। कुछ गलत संगति में पड़कर नशे या अपराध की ओर बढ़ जाते हैं, तो कुछ ऑनलाइन दोस्ती के मायाजाल में फंस जाते हैं। मोबाइल की अत्यधिक लत बच्चों को पढ़ाई, परिवार और उनके जीवन के मुख्य लक्ष्यों से बहुत दूर धकेल रही है। जब कोई अनहोनी, अपराध या बड़ा हादसा सामने आता है, तब परिवार के पास पछतावे और आँसुओं के अलावा कुछ बाकी नहीं रहता। बच्चे को महंगा स्मार्टफोन दिला देना आधुनिकता का प्रमाण नहीं है। असली आधुनिक सोच यह है कि बच्चे को संस्कार, अनुशासन, जिम्मेदारी और डिजिटल दुनिया के छिपे खतरों से अवगत कराया जाए। हर माता-पिता को यह बेहद बारीक अंतर समझना होगा कि बच्चे की ‘निजता’ (Privacy) का मतलब उसे पूरी तरह बेलगाम या बेपरवाह छोड़ देना नहीं है। ऐसे कदम उठाना जासूसी के दायरे में नहीं आता, बल्कि यह एक जिम्मेदार अभिभावक होने का प्राथमिक कर्तव्य है । सक्रिय निगरानी – समय-समय पर बच्चे का मोबाइल चेक करना, उसके कॉल लॉग्स और चैट पर नजर रखना। ऐप्स और गेमिंग की जानकारी – यह सुनिश्चित करना कि बच्चा किस प्रकार के ऐप्स और ऑनलाइन गेम्स का इस्तेमाल कर रहा है ।

उपस्थिति का सत्यापन – स्कूल या कोचिंग के समय में बच्चे की उपस्थिति की नियमित जानकारी लेना। दिनचर्या पर ध्यान – यह सुनिश्चित करना कि छुट्टी या क्लास खत्म होने के बाद बच्चा सीधे घर पहुँचे। शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी केवल स्कूल परिसर तक सीमित होती है। स्कूल के बाहर और घर की पूरी जिम्मेदारी परिवार की ही है। यदि माता-पिता ने समय रहते अपने बच्चों से स्वस्थ संवाद स्थापित नहीं किया और उन्हें ‘डिजिटल अनुशासन’ नहीं सिखाया, तो यह मोबाइल शिक्षा का साधन कम और एक बड़ा सामाजिक संकट अधिक बन जाएगा । आज समय की मांग सिर्फ बच्चों को गैजेट्स खरीद कर देने की नहीं है, बल्कि उनके जीवन, उनकी दिनचर्या, मित्र मंडली और ऑनलाइन गतिविधियों पर सजग और प्रेमपूर्ण निगरानी रखने की है। परवरिश में की गई एक छोटी-सी लापरवाही आपके बच्चे के पूरे भविष्य को अंधेरे में धकेल सकती है। सजग रहिए, संवाद बनाए रखिए और अपने बच्चों का मार्गदर्शक बनिए।

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