स्पेशल आर्टिकल: पवन माकन : आज के मॉडर्न और टेक्नोलॉजिकल ज़माने में, हमने कितनी भी तरक्की कर ली हो, सोशल और फैमिली वैल्यूज़ के मामले में हम कहाँ जा रहे हैं, यह बहुत चिंता की बात बन गई है। हाल ही में, समाज में एक मेंटल ट्रेंड देखा जा रहा है जहाँ हर कोई अपने ‘अधिकारों’ के लिए तो बहुत ज़्यादा जागरूक है, लेकिन जब बात अपने ‘कर्तव्यों’ या ‘ज़िम्मेदारियों’ को पूरा करने की आती है, तो वे चुप हो जाते हैं।
जब शादी में अनबन होती है या पत्नी से तलाक होता है, तो कानूनी नियमों के मुताबिक मेंटेनेंस पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं। अपने कानूनी अधिकारों के लिए लड़ना मुद्दा नहीं है, बल्कि सोचने वाली कड़वी सच्चाई यह है कि इसी समाज में, जिन माता-पिता ने हमें जन्म दिया, पाला-पोसा और बड़ा किया, उनके प्रति हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी कहाँ गायब हो जाती है?
आज, कई घरों में देखा जाता है कि शादी के कुछ ही समय में माता-पिता से अलग होने का क्रेज़ होता है। जिन माता-पिता ने अपनी खुशियों, इच्छाओं और अपनी जवानी को कुर्बान करके अपने बच्चों को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और समाज में इज्ज़त से जीने लायक बनाया; वही माता-पिता अचानक बुढ़ापे में “बोझ” लगने लगते हैं। जब उनकी सेवा करने, उनके साथ रहने और बुढ़ापे में सहारा बनने की बात आती है, तो वे अपने फायदे को सबसे ऊपर रखकर बहुत आसानी से और मुफ्त में अलग हो जाते हैं।
लेकिन, अजीब बात है कि जब उन्हीं माता-पिता की खुद कमाई हुई या पुश्तैनी प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी की बात आती है, तो सबसे पहले अपने हक और हिस्सेदारी की मांग की जाती है!
यह कैसा रिवाज है? यह कैसा इंसाफ है?
क्या माता-पिता से रिश्ता सिर्फ प्रॉपर्टी, घर या बैंक बैलेंस तक ही सीमित रह गया है? जब अपने हक पाने की बात आती है, तो कानून और रीति-रिवाजों की तो बहुत बातें होती हैं, लेकिन जब बूढ़े माता-पिता को प्यार, समय और दवा की ज़रूरत होती है, तो वे मुंह मोड़ लेते हैं। रिवाज सिर्फ किताबों या भाषणों में बात करने की चीज़ नहीं हैं, उन्हें ज़िंदगी में अपनाने की बात है। कानून आपको प्रॉपर्टी में हिस्सा दे सकता है, लेकिन कोई भी कानून आपको उन माता-पिता का
आशीर्वाद और मन की शांति नहीं दे सकता जिन्होंने आपको यह दुनिया दिखाई।
जब तक समाज में “सिर्फ़ पाने” का पागलपन रहेगा और “देने या सेवा करने” की भावना खत्म होती जाएगी, तब तक परिवार की नींव कमज़ोर होती रहेगी। आज दिन-ब-दिन बढ़ते ओल्ड एज होम देश की तरक्की नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक पतन की जीती-जागती निशानी हैं।
आज समय आ गया है कि समाज की हर युवा पीढ़ी, कपल और लीडर इस विषय पर गहराई से आत्मचिंतन करें। माता-पिता प्रॉपर्टी कमाने की मशीन नहीं, बल्कि हमारा वजूद हैं। अगर दौलत में हिस्सा चाहिए, तो बुढ़ापे में उनकी छत्रछाया बनकर उन्हें खाना, पानी और सेहत देने की ज़िम्मेदारी भी माननी होगी। अधिकारों और कर्तव्यों का यही बैलेंस ही एक हेल्दी, खुशहाल और आइडियल समाज बना सकता है।

