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ईमानदारी की सज़ा या भ्रष्टाचार का खेल? 50 साल से सीना ताने खड़ा है यह रोड, पर इसे बनाने वाला हुआ ‘ब्लैकलिस्ट’!

पुणे का जंगली महाराज रोड: न गड्ढे, न दरारें; हैरान कर देने वाली मजबूती के पीछे की कड़वी हकीकत

[विशेष ब्यूरो, महानगर मेट्रो] पुणे :आज के दौर में जहां करोड़ों की लागत से बनने वाली सड़कें पहली ही बारिश में कागज की तरह बह जाती हैं, वहीं पुणे का जंगली महाराज (JM) रोड भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मौन गवाह बनकर खड़ा है। ताज्जुब की बात यह है कि 1970 के दशक में बना यह रास्ता आज 50 साल बाद भी उतना ही मजबूत है जैसा पहले दिन था। लेकिन उससे भी बड़ा ताज्जुब यह है कि इसे बनाने वाले ईमानदार ठेकेदारों को इनाम देने के बजाय ‘ब्लैकलिस्ट’ कर दिया गया।

50 साल: न मरम्मत, न मेंटेनेंस

पुणे का यह व्यस्ततम मार्ग अपनी बेमिसाल क्वालिटी के लिए जाना जाता है। 1970 में जब इस सड़क का निर्माण हुआ, तब गुणवत्ता के ऐसे मानक तय किए गए कि आधी सदी बीत जाने के बाद भी इस पर न तो कोई गड्ढा पड़ा है और न ही कहीं दरार दिखाई दी है। यह सड़क आज की ‘गड्ढा-मुक्त’ राजनीति के दावों के बीच एक मिसाल है।

क्यों ब्लैकलिस्ट हुए निर्माता?

सूत्रों और स्थानीय दावों के अनुसार, इस सड़क को बनाने वाले कॉन्ट्रैक्टर्स को भविष्य में कोई सरकारी काम नहीं दिया गया और उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। इसके पीछे का कारण हैरान करने वाला है:

सिस्टम का ‘नुकसान’: सड़क इतनी मजबूत बनी कि दशकों तक इसके मेंटेनेंस या दोबारा निर्माण (Re-tendering) की जरूरत ही नहीं पड़ी।
भ्रष्टाचार की चेन टूटी: जानकारों का कहना है कि जब सड़क खराब ही नहीं होगी, तो नया टेंडर कैसे जारी होगा? और अगर टेंडर नहीं आएगा, तो भ्रष्टाचार का हिस्सा ऊपर तक कैसे पहुंचेगा?
ईमानदारी बनी दुश्मन: उस समय के कॉन्ट्रैक्टर्स ने कथित तौर पर सरकारी अधिकारियों के साथ ‘कमीशन’ साझा करने के बजाय पूरी रकम सड़क की मजबूती में लगा दी। परिणाम स्वरूप, विभाग ने उन्हें भविष्य के कामों से दूर कर दिया ताकि दोबारा कोई इतनी ‘टिकाऊ’ सड़क न बना सके।

आधुनिक इंजीनियरिंग के लिए एक सबक

आज स्मार्ट सिटी के नाम पर हर साल सड़कों की मरम्मत में हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं। जंगली महाराज रोड उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों के मुंह पर तमाचा है जो ‘जितनी खराब सड़क, उतना ज्यादा मुनाफा’ की मानसिकता से काम करते हैं।

महानगर मेट्रो का नजरिया

पुणे का JM रोड सिर्फ डामर और पत्थरों का मेल नहीं है, बल्कि यह उस युग की ईमानदारी का स्मारक है। यह सवाल उठाना लाजमी है कि जो तकनीक और नीयत 1970 में मौजूद थी, वह 2026 के हाई-टेक युग में क्यों गायब है? सरकार को उन ‘ब्लैकलिस्टेड’ कॉन्ट्रैक्टर्स की कहानियों को बाहर लाना चाहिए ताकि पता चले कि विकास में बाधा सड़क नहीं, बल्कि सिस्टम की नीयत थी।

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