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“श्री कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं जिन्हें हम खोजें, कृष्ण तो वह चेतना हैं जिसे हमें अपने हृदय में महसूस करना है।”

बाहरी खोज और भीतर का आभास : अनंत भागदौड़, सोशल मीडिया की चकाचौंध और भौतिक सुखों के पीछे अंधी दौड़ लगाते आज के समाज में इंसान लगातार कुछ अधूरा-सा महसूस करता है। हम शांति, प्रेम और ईश्वर को मंदिर के पत्थरों में, तीर्थयात्राओं में या बाहरी दुनिया में खोजने का प्रयास करते हैं। परंतु परम सत्य यह है कि कृष्ण कोई केवल स्थूल शरीर या ऐतिहासिक पात्र मात्र नहीं हैं, कृष्ण तो सच्चिदानंदमयी ‘चेतना’ हैं।

जब मनुष्य अपने अहंकार को पिघलाकर अपने हृदय की गहराइयों में झांकता है, तब उसे अनुभव होता है कि कृष्ण कहीं दूर नहीं हैं, बल्कि उसकी अपनी अंदर बहती सच्ची भावना और चेतना में ही विराजमान हैं।

आज के युग में ‘कृष्ण-चेतना’ को कैसे जिएं?

आज के समय में कृष्ण-भाव को हृदय में जगाने का अर्थ कोई संन्यास लेना या संसार छोड़ देना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ समाज में एक सजग और सकारात्मक नागरिक बनना है।

आज के युग में अक्सर लोग समस्याओं या जिम्मेदारियों से भागने का प्रयास करते हैं। कृष्ण-चेतना हमें सिखाती है कि परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो, अपने कर्तव्य से भागना कायरता है। अपने व्यवसाय, कार्यक्षेत्र या परिवार के प्रति संपूर्ण निष्ठा दिखाना ही सच्ची कृष्ण पूजा है।

आज के आधुनिक संबंधों में अपेक्षाएं और लेन-देन बढ़ गया है। राधा-कृष्ण का प्रेम हमें सिखाता है कि प्रेम स्वामित्व (अधिकार) स्थापित करने का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक और आत्मिक स्तर पर एक-दूसरे के प्रति समर्पित होने की भावात्मक ऊंचाई है।

श्री कृष्ण का पूरा जीवन संघर्षों से भरा हुआ था—जेल में जन्म, बचपन में राक्षसों का सामना, मथुरा छोड़ना और कुरुक्षेत्र का युद्ध। फिर भी, उनके मुख से वह मनमोहक मुस्कान कभी ओझल नहीं हुई। समाज के लिए संदेश यह है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, मन की शांति और हंसी कभी खोनी नहीं चाहिए।

कल्पना कीजिए कि एक डॉक्टर, एक शिक्षक या एक सामान्य सफाई कर्मचारी अपने काम को केवल पैसा कमाने का साधन न मानकर, उसे ‘जगत् के कल्याण का माध्यम’ मानता है। जब डॉक्टर मरीज की पीड़ा को अपनी समझकर उसका इलाज करता है, तब उस डॉक्टर के हृदय में ‘कृष्ण-चेतना’ कार्य कर रही होती है।

कृष्ण होने का अर्थ कोई अलग से चमत्कार करना नहीं है, बल्कि अपने रोजमर्रा के व्यवहार में करुणा, प्रेम और न्याय का चमत्कार प्रकट करना है।

“जब तक मन में ईर्ष्या, अहंकार और स्वार्थ है, तब तक कृष्ण केवल एक कहानी हैं। परंतु जब हृदय में प्रेम, करुणा और समर्पण जगता है, तभी कृष्ण का सच्चा अवतार होता है।”**

“मंदिर में स्थित मूर्ति हमें ईश्वर की याद दिलाती है, परंतु हमारे हृदय में स्थित चेतना हमें ईश्वर के होने का अहसास कराती है।”

“कुरुक्षेत्र केवल बाहर नहीं है, रोज हमारे मन में सद्गुणों और दुर्गुणों के बीच युद्ध चलता है; और इस युद्ध में विवेक रूपी कृष्ण का साथ लेना ही विजय का मार्ग है।”

यदि हमें समाज को अधिक सुंदर, प्रेमपूर्ण और न्यायप्रिय बनाना है, तो हमें कृष्ण को केवल पूजाघर तक सीमित रखने के बजाय अपने विचारों और आचरण में लाना होगा। जब हम प्रत्येक मनुष्य में, प्रत्येक जीव में उसी एक चैतन्य का अनुभव करेंगे, तभी इस पृथ्वी पर सच्चे अर्थों में ‘कृष्ण राज्य’ और मानवता का कल्याण संभव होगा।

दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट, नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित) स्पोर्ट्स टीचर

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