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मानवता शर्मसार : 70 फीट गहरे कुएं से मासूम को बचाने वाला ‘देवदूत’ उपेक्षित, क्या वीरता को केवल तालियों की दरकार है?

फिरोजाबाद : महानगर मेट्रो डेस्क : उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ एक 8 साल के मासूम ‘रोहित’ को उसके ही पड़ोसी ने अपहरण कर मौत के मुंह में धकेल दिया। लेकिन इस अंधेरी मौत और जिंदगी के बीच ढाल बनकर खड़े हुए भारतीय सैनिक शिवकुमार गौतम। अफसोस की बात यह है कि जहाँ शिवकुमार ने अपनी जान की परवाह किए बिना मासूम को नई जिंदगी दी, वहीं समाज और प्रशासन ने उन्हें एक ‘शुक्रिया’ कहना भी मुनासिब नहीं समझा।

घटना का मंजर : 70 फीट नीचे मौत का सन्नाटा 8 वर्षीय रोहित का अपहरण कर उसे एक सुनसान इलाके में स्थित 70 फीट गहरे सूखे कुएं में फेंक दिया गया था। कुआं इतना गहरा और संकरा था कि वहाँ ऑक्सीजन की कमी और जहरीले जीवों का खतरा था। जब गांव वालों को पता चला, तो सबकी रूह कांप गई, लेकिन कोई भी नीचे उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

फौजी का जज्बा : जब मौत को मात दी छुट्टी पर आए सेना के जवान शिवकुमार गौतम के लिए यह सिर्फ एक बच्चा नहीं, बल्कि देश का भविष्य था। उन्होंने बिना किसी आधुनिक रेस्क्यू गियर के, सिर्फ एक रस्सी के सहारे उस अंधेरे कुएं में उतरने का फैसला किया।

जोखिम: कुएं की दीवारें धंसने का डर था।
सफलता: शिवकुमार ने रोहित को अपने सीने से लगाया और सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

कड़वा सच : “कोई धन्यवाद नहीं मिला” हैरानी की बात यह है कि इस अदम्य साहस के बाद जहाँ चारों तरफ जश्न होना चाहिए था, वहीं शिवकुमार को उपेक्षा का सामना करना पड़ा। महानगर मेट्रो से बात करते हुए इस वीर सैनिक का दर्द छलका। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी इनाम का लालच नहीं था, लेकिन जिस समाज के लिए वे सरहद पर और गलियों में जान देते हैं, वहां से एक ‘आभार’ के शब्द की उम्मीद तो हर इंसान को होती है।

संपादकीय टिप्पणी : क्या हम संवेदना खो चुके हैं? एक तरफ पड़ोसी ने दुश्मनी में मासूम को कुएं में फेंका (मानवता का गिरता स्तर) और दूसरी तरफ एक रक्षक को अनदेखा किया गया (कृतज्ञता का अभाव)। यह घटना हमें आईना दिखाती है कि क्या हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि किसी की बहादुरी को स्वीकार करने का शिष्टाचार भी भूल गए हैं?

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