बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 2006 धमाकों के आरोपों से 4 लोगों को किया डिस्चार्ज; 31 मासूमों ने गंवाई थी जान।
ब्यूरो रिपोर्ट: महानगर मेट्रो : मुंबई/मालेगांव : देश को दहला देने वाले 2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। बुधवार, 22 अप्रैल को अदालत ने इस मामले के चार आरोपियों को सभी आरोपों से मुक्त (डिस्चार्ज) करने का आदेश दिया। कोर्ट के इस फैसले ने दो दशक पुराने इस मामले में एक नया मोड़ ला दिया है।
इंसाफ की दहलीज पर 20 साल का इंतजार
8 सितंबर 2006 का वह काला दिन आज भी मालेगांव के लोगों के जेहन में ताजा है। शब-ए-बारात के मौके पर जब हमीदिया मस्जिद के पास कब्रिस्तान में लोग इबादत के लिए जुटे थे, तब हुए सिलसिलेवार धमाकों ने खुशियों को मातम में बदल दिया था। इस आतंकी हमले में:
31 बेगुनाह लोगों की मौत हुई थी।
300 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
जांच एजेंसियों पर उठे सवाल
इस मामले की जांच पहले महाराष्ट्र एटीएस (ATS) और फिर सीबीआई (CBI) ने की थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने पाया कि इन चार आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं। कोर्ट का यह फैसला उन जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है, जिन्होंने सालों तक इन आरोपियों को कटघरे में रखा था।
पीड़ित परिवारों की अधूरी आस
अदालत के इस फैसले के बाद एक तरफ जहां आरोपियों ने राहत की सांस ली है, वहीं दूसरी तरफ धमाके में अपने परिजनों को खोने वाले परिवारों के घाव फिर से हरे हो गए हैं। सवाल यह उठता है कि अगर ये दोषी नहीं थे, तो फिर असली गुनहगार कौन है? क्या 20 साल बाद भी पीड़ितों को पूर्ण न्याय मिल पाएगा?
महानगर मेट्रो की विशेष टिप्पणी: ‘सबूतों का अभाव’ या ‘जांच में ढिलाई’? 20 साल की लंबी कानूनी लड़ाई और अंत में नतीजा सिफर। क्या हमारी न्यायिक व्यवस्था में बेगुनाहों को सजा और गुनहगारों को रास्ता मिल रहा है?

