गुजरात के पिछड़े जिले छोटाउदयपुर के तुरखेड़ा गाँव की हृदयविदारक वास्तविकता
विकास के बड़े दावों और ‘विश्वगुरु’ के नाटक के सामने गंभीर सवालों का घेरा
“सरकार और तंत्र द्वारा आवंटित ग्रांट के करोड़ों रुपये खुर्द-बुर्द कर दिए गए हैं,” ग्रामीणों का आक्रोश
राज्य सरकार द्वारा शहरी विकास, बुलेट ट्रेन और गगनचुंबी इमारतों के भव्य दावे किए जाते हैं, लेकिन इन चमकती हुई तख्तियों के पीछे गुजरात का एक ऐसा दर्दनाक सच भी छिपा है जो आँखें खोलने के लिए काफी है। ‘पाक्को गुजरात’ की टीम जब राज्य के अत्यंत पिछड़े माने जाने वाले जिले छोटाउदयपुर के दूरदराज इलाकों में जमीनी हकीकत जानने पहुँची, तो जो दृश्य नजर आए, वे सरकार के विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी थे।
तुरखेड़ा गाँव: जहाँ सड़क के अभाव में प्रसूताओं की जान जोखिम में पड़ती है
छोटाउदयपुर जिले का तुरखेड़ा गाँव आज भी ऐसी पिछड़ी और दुर्गम स्थिति में जी रहा है जहाँ आधुनिक सुविधाओं की एक किरण भी नहीं पहुँची है। आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी यदि किसी गर्भवती महिला (प्रसूता) या गंभीर मरीज को अस्पताल तक पहुँचाने के लिए पक्की सड़क उपलब्ध न हो, और उन्हें ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्तों पर कपड़े की झोली या खाट पर लिटाकर किलोमीटरों तक पैदल चलने के लिए मजबूर होना पड़े, तो यह हमारे तथाकथित
प्रगतिशील तंत्र पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
आपातकाल की घड़ियों में एम्बुलेंस भी गाँव तक नहीं पहुँच पाती है, जिसके चलते समय-समय पर कई मरीजों और प्रसूताओं को उचित उपचार के अभाव में काल का ग्रास बनना पड़ता है। हाशिए पर धकेल दी गई ये जिंदगियाँ आज भी प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ न्याय माँग रही हैं।
ग्रांट के करोड़ों रुपये कहाँ गायब हो गए? ग्रामीणों के गंभीर आरोप
ग्रामीणों में प्रशासन और सरकार के खिलाफ भड़का आक्रोश अब छिपा नहीं है। ग्रामीणों का स्पष्ट और गंभीर आरोप है कि कागज पर आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों के उत्थान के लिए करोड़ों रुपये आवंटित किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में वे पैसे जमीन पर कभी दिखाई नहीं देते।
सरकारी तंत्र और जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से विकास के नाम पर आवंटित करोड़ों की राशि में कागजों पर ही भ्रष्टाचार कर लिया गया है। केवल कागजों पर ही काम दिखाकर बिल पास करा लिए गए हैं, लेकिन जमीन पर न तो सड़क बनी है और न ही कोई अन्य बुनियादी सुविधा विकसित हुई है।
विकास के दावे खोखले: जिम्मेदार कौन?
एसी कमरों और स्टूडियो में बैठकर विकास के आंकड़े पेश करने वालों ने छोटाउदयपुर के इन दूरदराज गाँवों की पीड़ा को कभी देखने का प्रयास किया है क्या? क्या आदिवासी क्षेत्रों के नागरिकों के मानवाधिकार नहीं हैं? केवल चुनावी राजनीति के अलावा आम जनता के मुद्दों के प्रति इतनी उदासीनता क्यों?

