जब शब्दों के सारे दरवाजे बंद हो जाएं, तब भीतर सुलगती खामोशी का कोलाहल
शिकायतें और आंसू जब अनसुने रह जाएं, तो संवादहीनता का यह सन्नाटा क्या कहता है?
“सब ठीक हो गया है” का भ्रम पालने वालों के लिए एक चेतावनी: यह हार नहीं, उम्मीद का अंत है
समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि अगर किसी रिश्ते में बहस थम गई है, विवाद रुक गए हैं और घर में एक गहरी शांति छा गई है, तो सब कुछ ठीक हो गया है। लेकिन यह शांति, यह मौन अक्सर उन तूफानों की आहट होती है जो सब कुछ भीतर ही भीतर जलाकर राख कर चुके होते हैं। जब एक स्त्री मौन हो जाती है, तो इसका कतई यह अर्थ नहीं होता कि उसके पास कहने के लिए अब कुछ शेष नहीं बचा है। इसके पीछे एक लंबी, थका देने वाली और अनसुनी दास्तान छिपी होती है।
अनसुनी चीखें और आंसुओं का सफर
एक स्त्री जीवनभर अपने रिश्तों को सींचने के लिए न जाने कितने जतन करती है। वह अपनी व्यथा कहती है, अपनी अपेक्षाएं रखती है, मन की पीड़ा को कभी शिकायतों के जरिए तो कभी आंसुओं की भाषा में बयां करती है। वह बार-बार अपनों को समझाने के अनगिनत प्रयत्न करती है।
लेकिन संकट तब शुरू होता है जब उसके इन तमाम शब्दों और संवेदनाओं को बार-बार अनसुना कर दिया जाता है। उसकी भावनाओं को महत्वहीन समझ लिया जाता है और उसकी खामोशी को उसकी ‘सहमति’ मान लिया जाता है। यहीं से उसके भीतर धीरे-धीरे एक ऐसा सन्नाटा पसरने लगता है जो शब्दों से भी ज्यादा खतरनाक होता है।
जब अधरों तक आते-आते ठहर जाते हैं शब्द
एक समय ऐसा आता है जब उसका हृदय भीतर ही भीतर क्रंदन तो करता है, मगर उसके दर्द भरे शब्द उसके अधरों तक आते-आते ही ठहर जाते हैं। भावनाओं का स्पंदन दिल की गहराइयों में तड़पता रहता है, लेकिन वह अपनी आंतरिक व्यथा को दुनिया या अपनों के सामने रखने का साहस भी पूरी तरह खो बैठती है।
इसके बाद वह न तो कोई सवाल करती है, न कोई तर्क देती है और न ही अपनी पीड़ा का कोई स्पष्टीकरण मांगती है। वह बस मौन हो जाती है। यह मौन शब्दों की समाप्ति नहीं होता, बल्कि यह उस ‘आहत विश्वास’ की अंतिम अभिव्यक्ति होता है जो अंदर से टूट चुका होता है।
शिकायतों का छूट जाना: उम्मीद के मरने की आखिरी निशानी
याद रखिए, स्त्री का बोलना इस बात का प्रमाण था कि उसे आज भी किसी से उम्मीद है—यह उम्मीद कि कोई उसे समझेगा, उसके दर्द को महसूस करेगा। लेकिन उसका मौन उसी उम्मीद के हमेशा के लिए दम तोड़ देने का प्रतीक होता है।
जिस दिन कोई स्त्री आपसे शिकायत करना बंद कर दे, उस दिन यह खुशफहमी बिल्कुल न पालें कि अब सब कुछ ठीक हो गया है। शायद उस दिन उसने आपको समझाने की अपनी आखिरी कोशिश भी हमेशा के लिए छोड़ दी है। स्त्री का यह मौन कभी कोई शून्य नहीं होता; इसमें अनकहे शब्दों का कोलाहल, दबे हुए क्रंदन की गूंज और बुझते हुए विश्वास का अंतिम स्पंदन छुपा होता है।
संपादकीय टिप्पणी: रिश्तों में संवाद की डोर टूटने न दें। किसी अपने का मौन यदि आपको शांत कर रहा है, तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं संवाद की कमी ने उसे अंदर से तोड़ दिया है।— ‘महानगर मेट्रो’

