हॉस्टल में रहने वाले आदिवासी बच्चों के पास जूते नहीं थे। कलेक्टर के सामने बच्चों ने अपनी मांग रखी तो उन्होंने एक मुहिम खड़ी कर दी है। पहले चरण में खुद और सहकर्मियों के पैसों से बच्चों के लिए 200 जोड़ी जूते मंगवाए हैं। जिले के अन्य हॉस्टलों में भी जूते बांटे जाएंगे।
हाइलाइट्स
डिंडोरी कलेक्टर के सामने आदिवासी बच्चों ने रखी जूते की मांग
कलेक्टर ने खुद और अधिकारियों से कलेक्ट के पैसे, बच्चों के लिए मंगवाए जूते
200 बच्चों को हॉस्टल में दिए गए नए जूते
अन्य हॉस्टल के बच्चों के लिए भी चलाई जा रही है जूतों की मुहिम
डिंडोरी: कलेक्टर अंजू भदौरिया ने हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए एक मुहिम शुरू की है। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से बच्चे कई चीजों से महरूम थे। हॉस्टल में रहने वाले बच्चे दौड़ना तो चाहते थे। हॉस्टल के मैदान में फुटबॉल और दूसरे खेल खेलना चाहते थे। लेकिन बारिश के बाद हॉस्टल के कमरों से सब कुछ ललचाई हुई नजरों से देखते थे।
पैरों में नहीं थे जूते
आदिवासियों हॉस्टलों में रहने वाले इन बच्चों के पैरों में जूते नहीं थे। गंदे और गीले पैरों की वजह से अक्सर इंफेक्शन और घाव हो जाते थे। साथ ही घास में छिपे कीड़े-मकोड़ों और रेंगने वाले जीवों का भी खतरा रहता था। बच्चों ने खाने, क्लासरूम या सुविधाओं के बारे में डिंडोरी कलेक्टर से कोई शिकायत नहीं की। उनलोगों ने मैडम से बस जूते मांगे।
मुहिम का रूप लिया
डिंडोरी कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया से की गई यह छोटी मांग ने अब जिले में मुहिम का रूप ले लिया है। इसका मकसद आदिवासी बहुल जिले के सभी 144 हॉस्टलों में रहने वाले बच्चों को जूते उपलब्ध करवाना है।
खेल नहीं रहे थे बच्चे
यह सोल ऑफ सोल मुहिम की शुरुआत तब शुरू हुई, जब कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने 7 अगस्त को मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत अमरपुर स्थित राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह बॉयज आश्रम का दौरा किया। उन्होंने देखा कि बच्चे खेल नहीं रहे थे। इसलिए उन्होंने उनसे इसकी वजह पूछी।
जूते नहीं हैं हमारे पास
बच्चों ने कलेक्टर मैडम को जवाब दिया कि हम खेलना तो चाहते हैं लेकिन हमारे पास जूते नहीं हैं। उन्होंने बताया कि बारिश के मौसम में कीचड़ और जमा पानी से पैर गंदे हो जाते थे, जिससे कभी-कभी बीमारियां हो जाती थीं। बच्चों ने कलेक्टर से पूछा कि क्या कोई उन्हें जूते खरीदकर दे सकता है।
खेल के बिना बचपन है अधूरा
बच्चों की बात सुनकर कलेक्टर भदौरिया ने कहा कि खेल के बिना बचपन अधूरा है। इसके बाद कलेक्टर ने दूसरे हॉस्टलों से जानकारी जुटाई और पाया कि यह समस्या सिर्फ अमरपुर तक ही सीमित नहीं थी। हॉस्टलों में रहने वाली बड़ी संख्या में आदिवासी छात्र बिना जूतों के थे। इस मुहिम के लिए से कोई अलग फंड न होने के कारण, भदौरिया और दूसरे अधिकारियों ने अपनी तरफ से पैसे जमा करके इस पहल को शुरू किया। हॉस्टलों से बच्चों के जूतों के साइज की जानकारी ली गई और 29 अगस्त को लगभग 200 छात्रों को जूते दिए गए।
अन्य हॉस्टलों में भी बांटे जाएंगे जूते
यह मुहिम अब शाहपुरा स्थित रानी दुर्गावती गर्ल्स आश्रम के गर्ल्स हॉस्टल तक पहुंचेगी, जहां 11 सितंबर को जूते बांटे जाएंगे। प्रशासन को उम्मीद है कि हॉस्टलों की बड़ी संख्या को देखते हुए, वे आगे चलकर बैंकों और सीएसआर पार्टनर्स को भी इस मुहिम से जोड़ पाएंगे।

