कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। कीमतों में इस बढ़ोतरी से आम जनता को बचाने के लिए भारत सरकार जीडीपी के लगभग 1.7% का वित्तीय बोझ खुद उठा रही है। हालांकि, सितंबर में तेल आयात बिल में 46% का उछाल आया है। इससे सरकारी खजाने और राजकोषीय स्थिरता पर भारी दबाव बढ़ रहा है।
नई दिल्ली: कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतें हाल में बढ़ी हैं। लेकिन, उसी अनुपात में पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधनों के दाम नहीं बढ़े हैं। इसकी वजह केंद्र, राज्य सरकारें, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रयास हैं। ये मिलकर ऊंची कीमतों के बोझ का एक बड़ा हिस्सा उठा रहे हैं। मकसद उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके असर को कम करना है। हालांकि, इस मदद की लागत बढ़ती जा रही है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि सरकारी खजाने पर दबाव डाले बिना सरकार कब तक इस ‘ऑयल शॉक’ को झेल सकती है।
एक्सिस बैंक रिसर्च ने एक रिपोर्ट जारी की है। इसके अनुसार, अगर इस साल कच्चे तेल की औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो केंद्र, राज्यों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और RBI की ओर से दी जा रही कुल मदद GDP के लगभग 1.7% के बराबर होने का अनुमान है।
ईंधन के बोझ का पूरा गणित
रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर खुदरा ईंधन की कीमतें नहीं बदलती हैं तो कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से सरकार पर पड़ने वाला यह बोझ GDP के 20 बेसिस पॉइंट (0.20%) तक बढ़ जाएगा।
सितंबर में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल पिछले साल के मुकाबले 46% बढ़ा है। यह बढ़कर 15.4 अरब डॉलर हो गया। यह पहले 10.5 अरब डॉलर था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मिडिल ईस्ट में फिर से तनाव बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ गईं।
इस महीने कच्चे तेल के आयात की मात्रा में 7% की बढ़ोतरी हुई। जबकि भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 116.09 डॉलर प्रति बैरल रही। यह अप्रैल में दर्ज 114.48 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा है।
अप्रैल से सितंबर के बीच आयात बिल एक साल पहले के 61.9 अरब डॉलर से 46.3% उछलकर 90.6 अरब डॉलर हो गया। इसका मुख्य कारण कीमतों में बढ़ोतरी है। मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई में रुकावट और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास शिपिंग से जुड़े बढ़ते जोखिमों ने भारत के लिए कच्चे तेल के आयात की लागत का दबाव और बढ़ा दिया है।
इस लागत को कौन उठा रहा है?
केंद्र सरकार GDP के लगभग 0.8% के बराबर मदद दे रही है। इसमें ऑटो ईंधन (पेट्रोल-डीजल) पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती, उर्वरक पर अधिक सब्सिडी और घरेलू एलपीजी की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी जैसे उपाय शामिल हैं। अप्रैल-अगस्त के दौरान पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में उर्वरक सब्सिडी में 21% की बढ़ोतरी हुई है। जबकि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए LPG पर होने वाला नुकसान (अंडर-रिकवरी) 57,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।
उम्मीद है कि तेल कंपनियां (OMCs) और राज्य सरकारें GDP के लगभग 0.7% के बराबर अतिरिक्त सहायता देंगी। इसमें पेट्रोल और डीजल पर OMCs को होने वाला नुकसान और राज्यों की ओर से वसूले जाने वाले वैल्यू ऐडेड टैक्स (VAT) में कमी शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार, कंसेशनल फॉरेन एक्सचेंज स्वैप से जुड़ी सब्सिडी और विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के प्रभाव के जरिए RBI का योगदान GDP के लगभग 0.2% के बराबर है।
ये सभी उपाय मिलकर तेल की ऊंची कीमतों के तत्काल असर को कम करने में मदद करते हैं। हालांकि, यह लागत खत्म नहीं होती। इसके बजाय यह सरकारी खजाने, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की कमाई और सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य हिस्सों में बंट जाती है।
सरकार कब तक इस झटके को झेल सकती है?
हाल ही में तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। एक्सिस बैंक रिसर्च के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई। जबकि ‘डेटेड ब्रेंट’ 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
रिपोर्ट का अनुमान है कि सोने पर शुल्क बढ़ाने, पेट्रोलियम उत्पादों पर अप्रत्याशित मुनाफे को वसूलने के लिए निर्यात शुल्क लगाने और इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड के जरिए GDP के 0.6% के बराबर वित्तीय गुंजाइश बनाई जा सकती है।
ये उपाय वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को GDP के लगभग 20-30 आधार अंकों तक सीमित रखने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे तेल की कीमतें कब तक ऊंची बनी रहती हैं। रिपोर्ट का तर्क है कि अगर यह झटका लंबे समय तक बना रहता है तो सरकार की ओर से दी जाने वाली सहायता को कम किया जाना चाहिए ताकि बढ़ी हुई लागत का एक बड़ा हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाला जा सके।
उपभोक्ताओं के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि अगर सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र अब पूरा बोझ नहीं उठा पाते हैं तो उन्हें ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से मिलने वाली सुरक्षा कम हो जाएगी। सरकारी वित्त के लिए चुनौती यह होगी कि अल्पकालिक राहत और राजकोषीय स्थिरता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मुख्य सवाल यह नहीं है कि आज महंगे तेल का खर्च कौन उठा रहा है, बल्कि यह है कि अगर कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र कब तक इस बोझ को उठा सकता है।

