प्रकृति के तीन गुणों को पहचानना ही स्व-परिवर्तन की कुंजी है।
अध्याय १३ में हमने समझा कि शरीर (क्षेत्र) और उसे जानने वाला आत्मा (क्षेत्रज्ञ) दोनों बिल्कुल अलग हैं। यदि आत्मा शुद्ध और निर्मल है, तो फिर एक ही प्रकृति से बने हम सबके स्वभाव इतने अलग क्यों होते हैं? क्यों कोई व्यक्ति शांति से सोचकर निर्णय लेता है, कोई लगातार सफलता की अंधी दौड़ में रहता है, और कोई अपनी क्षमता होने के बावजूद केवल आलस्य में समय बर्बाद करता है?
हमारे विचारों और व्यवहार का यह अदृश्य संचालक कौन है? इस महत्वपूर्ण प्रश्न का समाधान भगवान श्रीकृष्ण १४वें अध्याय ‘गुणत्रय विभाग योग’ में देते हैं।
प्रकृति की तीन रस्सियां (गुण) सत्व, रजस और तमस
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि पूरी प्रकृति तीन गुणों से बनी है। ये तीन गुण ऐसी रस्सियां (बंधन) हैं, जो मुक्त आत्मा को शरीर और संसार के साथ बांधे रखती हैं। प्रत्येक मनुष्य में ये तीनों गुण मौजूद होते हैं, केवल समय और परिस्थितियों के अनुसार इनकी मात्रा अलग-अलग होती है।
१. तमोगुण – अज्ञान और आलस्य का बंधन:
यह गुण अज्ञान से जन्म लेता है। यह व्यक्ति को आलस्य, नींद, अंधविश्वास और प्रमाद में धकेलता है।
धार्मिक दृष्टि से यह कुंभकर्ण जैसी प्रवृत्ति है, जो केवल निद्रा और अज्ञान में ही मग्न रहता है। वर्तमान संदर्भ में, यह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य जानने की जिज्ञासा के बिना केवल भय या देखा-देखी से धर्म का पालन करता है।
व्यावहारिक दृष्टि से कोई छात्र या खिलाड़ी जानता है कि मेहनत जरूरी है, फिर भी लगातार समय बर्बाद करता है और विफलता के लिए भाग्य को दोष देता है। तमस मनुष्य का आध्यात्मिक और व्यावहारिक विकास रोक देता है।
विफलता से अधिक अपनी गलती से सीखने से इनकार करना ज्यादा नुकसानदायक है।
२. रजोगुण – इच्छा और प्रतिस्पर्धा की दौड़:
यह गुण लोभ, अहंकार और अत्यधिक सांसारिक इच्छाओं से जन्म लेता है। रजोगुणी व्यक्ति लगातार कुछ पाने की दौड़ में होता है।
रावण या हिरण्यकशिपु जैसे पात्र, जिन्होंने कठोर तपस्याएं तो कीं, लेकिन उनका उद्देश्य सत्ता और अहंकार को पोषित करना था। यह सकाम भक्ति है, जहां ईश्वर के पास भी शर्तों के साथ जाया जाता है।
एक खिलाड़ी मेडल जीतने के लिए मेहनत करे यह अच्छी बात है, लेकिन जब उसकी पूरी खुशी केवल मेडल पर ही निर्भर हो जाए, तब हार उसे अंदर से तोड़ देती है। रजस मनुष्य को कर्म के फल की आसक्ति में बांधता है।
सफलता पाना प्रगति है, लेकिन सफलता के बीच मन की शांति बनाए रखना ही सच्ची समृद्धि है।
३. सत्त्वगुण – ज्ञान और संतुलन का प्रकाश:
यह गुण प्रकाश, शांति, विवेक और समझदारी देता है। मुसीबत आने पर दूसरों को दोष देने के बजाय अपनी गलती पहचानकर सुधारने का प्रयास करना सत्त्वगुण की निशानी है।
युधिष्ठिर या विभीषण जैसी प्रवृत्ति, जो धर्म और सत्य के मार्ग पर चले। यह निष्काम भक्त हैं।
परंतु सत्त्वगुण भी मनुष्य को ‘मैं सबसे बड़ा भक्त हूं’, ‘मैं पुण्यशाली हूं’ या ‘मैं ज्ञानी हूं’ जैसे सूक्ष्म अहंकार से बांध सकता है। (यह लोहे की नहीं बल्कि सोने की बेड़ी है, पर है तो बेड़ी ही!)
गुणातीत कैसे बनें? (तीनों गुणों से पार जाने की यात्रा)
केवल तमस से रजस में और रजस से सत्त्व गुण की ओर प्रगति करना ही पर्याप्त नहीं है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी वह है जो इन तीनों गुणों से परे यानी ‘गुणातीत’ हो जाए।
गुणातीत व्यक्ति कैसा होता है?
जैसे कीचड़ में खिला हुआ कमल पानी में रहने के बावजूद उससे भीगता नहीं है, या राजा जनक जो संसार में रहकर भी राजपाट चलाते थे फिर भी ‘विदेही’ थे। कोई आपकी प्रशंसा करे तब अहंकार से फूल न जाना और कोई आलोचना करे तब गुस्से में विवेक न खो बैठना – यह गुणातीत अवस्था है।
वह जानता है कि जो कुछ हो रहा है वह केवल प्रकृति के गुणों का ही खेल है, मेरी आत्मा तो इन सबका केवल साक्षी है।
हर परिस्थिति आपके नियंत्रण में नहीं है, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया को समझदारी से ढालने का प्रयास आपके हाथ में है।
गुणातीत होने का मार्ग: समर्पण और भक्ति
अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण इन गुणों की माया से बाहर आने का निश्चित मार्ग बताते हैं।
भक्ति का अर्थ केवल मंदिर में बैठे रहना नहीं है; बल्कि अहंकार छोड़ना, अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाना (“मैं ही सब करता हूं” ऐसा अहंकार छोड़कर), दूसरों की सफलता से ईर्ष्या न करना और हर परिस्थिति में परमात्मा पर श्रद्धा रखना है।
गीता का यह अध्याय हमें दूसरों को जज करने के बजाय अपना ही निरीक्षण करना सिखाता है। रोज़ आईने के सामने खड़े रहकर खुद से पूछें – आज मेरे निर्णयों पर किस गुण का प्रभाव था? जब बिना कारण गुस्सा आया तब क्या रजस गुण हावी था? आलस्य आया तब तमस था?
जीवन की सबसे बड़ी जीत मैदान में दूसरों को हराने में नहीं है, बल्कि अपने ही मन के रणमैदान में अपने अहंकार, लोभ और आलस्य को पहचानकर उस पर विजय प्राप्त करने में है! जल-कमलवत् (कमल के पत्ते की तरह) संतुलन विकसित करना, यही सच्चा योग है।
क्रमशः…
आगामी अध्याय १५ (पुरुषोत्तम योग) में हम जानेंगे:
“संसार रूपी उल्टे अश्वत्थ वृक्ष का रहस्य क्या है? इसकी जड़ें ऊपर क्यों हैं? और क्षर, अक्षर तथा पुरुषोत्तम के तत्वों को समझकर जीवन के परम सत्य तक कैसे पहुंचा जा सकता है?”
दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट, नेशनल अवार्ड से सम्मानित) स्पोर्ट्स टीचर।

