मनुष्य पूरी जिंदगी संसार की डालियों को पकड़े रहता है, लेकिन मुक्ति तब मिलती है जब वह आसक्ति के बंधनों को काटना सीखता है।
उलटा अश्वत्थ वृक्ष: संसार का सबसे बड़ा रहस्य!
अध्याय १३ में हमने शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के बीच का भेद समझा। अध्याय १४ में प्रकृति के तीन गुणों द्वारा अपने स्वभाव और व्यवहार का रहस्य जाना। अब अध्याय १५ में भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण संसार की रचना का एक अद्भुत रहस्य समझाते हैं।
श्रीकृष्ण संसार की तुलना एक उलटे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष से करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और डालियां नीचे फैली हुई हैं। सामान्य वृक्ष की जड़ें जमीन में और डालियां आकाश की ओर होती हैं, लेकिन यहाँ श्रीकृष्ण संसार को उलटे वृक्ष के रूप में वर्णित करते हैं। इसका मूल परमात्मा में है और इसकी शाखाएं संपूर्ण संसार, संबंधों, इच्छाओं, कर्मों और भौतिक जीवन में फैली हुई हैं।
नदी के पानी में खड़े वृक्ष का प्रतिबिंब देखिए। वास्तविक वृक्ष ऊपर होता है, लेकिन पानी में उसका प्रतिबिंब उलटा दिखाई देता है। उसी तरह इस भौतिक संसार को परम तत्त्व के आधार पर समझाया जा सकता है। हम प्रतिबिंब को ही वास्तविकता मानकर उसमें उलझ जाते हैं और मूल सत्य को भूल जाते हैं। मनुष्य पूरी जिंदगी घर बनाने, संपत्ति इकट्ठी करने, पद पाने और समाज में अपनी पहचान बनाने में बिता देता है। लेकिन जिस शरीर के लिए इतनी भागदौड़ करता है, वह शरीर भी एक दिन नाशवान है।
हम डालियों को अपना सर्वस्व मान बैठे हैं, जबकि हमारा सच्चा अस्तित्व तो उसकी जड़ों को पहचानने में निहित है।
संसार का बंधन वस्तुओं में नहीं, आसक्ति में है!
इस संसार रूपी वृक्ष को प्रकृति के तीन गुण – सत्त्व, रजस और तमस पोषित करते हैं। इसकी शाखाओं का विस्तार इच्छाओं, कर्मों और विषय-वासनाओं द्वारा होता रहता है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी इच्छा जन्म लेती है। संपत्ति मिले तो और संपत्ति चाहिए, पद मिले तो और ऊँचा पद चाहिए और प्रशंसा मिले तो निरंतर प्रशंसा की अपेक्षा रहती है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं है!
एक व्यक्ति पूरी जिंदगी अपने परिवार के लिए मेहनत करता है। बच्चों को पढ़ाता है, घर बनाता है और संपत्ति इकट्ठी करता है। यह सब कर्तव्य है। लेकिन जब वह अपनी खुशी और शांति को केवल बच्चों की सफलता के साथ जोड़ देता है, तब अपेक्षाओं का बंधन शुरू होता है।
संतान अपनी पसंद का मार्ग चुने तो दुख, अपनी इच्छा के अनुसार न चले तो क्रोध और अपनी बात न माने तो रिश्तों में कड़वाहट!
प्रेम धीरे-धीरे अधिकार में और अधिकार आसक्ति में बदल जाता है।
यही मोह है।
श्रीकृष्ण इस मोह रूपी वृक्ष को काटने के लिए ‘असंग शस्त्र’ यानी अनासक्ति और वैराग्य का शस्त्र बताते हैं।
यहाँ वैराग्य का अर्थ घर-परिवार छोड़कर जंगल में जाना नहीं है। वैराग्य यानी संसार में रहकर भी संसार के मोह में न बंधना। रिश्ते निभाएं, लेकिन मालिकाना हक न रखें। संपत्ति कमाएं, लेकिन अहंकार न रखें। कर्तव्य निभाएं, लेकिन आसक्ति के गुलाम न बनें।
वैराग्य का अर्थ भागना नहीं, मोह पर जीत हासिल करना है!
बहुत से लोग मानते हैं कि आध्यात्मिक बनने का अर्थ दुनिया से दूर हो जाना है। लेकिन गीता हमें जिम्मेदारियों से भागना नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के बीच निर्लेप रहना सिखाती है। राजा जनक इसके उत्तम उदाहरण हैं। वे विशाल राज्य का संचालन करते थे, फिर भी आंतरिक रूप से आसक्ति से परे थे। इसलिए उन्हें ‘विदेही’ कहा जाता है।
हम भी जीवन में संपत्ति कमाएं, लेकिन संपत्ति का अहंकार हमें न चलाए। पद पाएं, लेकिन पद हमारे व्यक्तित्व को न निगल जाए। रिश्ते निभाएं, लेकिन अपेक्षाओं के बोझ से अपनी शांति न खोएं।
वस्तुओं का उपयोग करें, लेकिन वस्तुओं को अपनी पहचान न बनने दें। संसार में रहना बंधन नहीं है, लेकिन संसार को ही अपना सर्वस्व मान लेना बंधन है।
क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम: अस्तित्व के तीन महान सत्य!
(१) क्षर पुरुष – जिसका क्षय होता है:
यह संपूर्ण नाशवान भौतिक जगत है। शरीर, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और दुनिया की तमाम भौतिक वस्तुएं परिवर्तनशील हैं। आज जो सत्ता और सम्मान हमारे हाथ में है, वह कल किसी और के हाथ में हो सकता है।
एक अधिकारी को अपने पद का इतना अहंकार हो कि उसके आस-पास के लोग उसे सम्मान देते हैं इसलिए वह खुद को महान समझने लगे। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद पद चला जाता है और उसे समझ आता है कि पद और व्यक्तिगत व्यक्तित्व दोनों अलग हैं। पद स्थायी नहीं है, लेकिन पद पर रहकर बनाया गया व्यक्तित्व लंबे समय तक याद रहता है।
(२) अक्षर पुरुष – अविनाशी जीवात्मा:
शरीर नाशवान है, लेकिन आत्मा अविनाशी है। जीवात्मा शरीर से अलग है और शरीर के नाश से उसका नाश नहीं होता। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा भी पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है। यह समझ हमें शरीर की तुलना में आत्मा की पहचान का महत्त्व समझाती है।
(३) पुरुषोत्तम – सर्वोच्च परम तत्त्व:
क्षर और अक्षर दोनों से परे जो सर्वोच्च परमात्मा हैं, वे पुरुषोत्तम हैं। श्रीकृष्ण स्वयं को इस सर्वोच्च पुरुषोत्तम के रूप में पहचानते हैं। सूर्य को प्रकाश देने वाले, चंद्रमा में शीतलता देने वाले और संपूर्ण सृष्टि को धारण करने वाले परम तत्त्व वही हैं। जैसे एक ही बिजली के आधार पर घर में पंखा, लाइट और अन्य उपकरण अलग-अलग कार्य करते हैं, वैसे ही संपूर्ण सृष्टि में अनेक रूपों और विविधताओं के होने के बावजूद उसका मूल आधार एक ही परमात्मा है। रूप अनेक हैं, लेकिन मूल तत्त्व एक है। यही पुरुषोत्तम योग की गहरी समझ है।
आत्मा की यात्रा: शरीर बदलता है, संस्कारों की यात्रा जारी रहती है!
इस अध्याय में श्रीकृष्ण जीवात्मा की एक महत्त्वपूर्ण बात समझाते हैं। जैसे हवा अपने साथ फूलों की सुगंध ले जाती है, वैसे ही जीवात्मा एक शरीर छोड़ते समय मन और इंद्रियों के संस्कारों को अपने साथ ले जाती है और दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। मनुष्य जैसा सोचता है, जैसे कर्म करता है और जैसी वृत्तियां विकसित करता है, वह उसके आध्यात्मिक अस्तित्व के साथ जुड़ी रहती हैं। इसलिए जीवन केवल भौतिक सुख इकट्ठा करने की यात्रा नहीं है, बल्कि अपने विचारों, कर्मों और चेतना को शुद्ध करने की यात्रा भी है। शरीर का अंत होता है, लेकिन आत्मा की यात्रा शरीर के अंत के साथ समाप्त नहीं होती।
ईश्वर केवल मंदिर में नहीं, हमारे हृदय में भी हैं!
इस अध्याय का अत्यंत सुंदर संदेश यह है कि परमात्मा संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं और प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करते हैं। स्मृति, ज्ञान और विस्मृति का आधार भी वही हैं। कृष्ण कहते हैं कि मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके सभी जीवों को धारण करता हूँ और चंद्र रूप में औषधियों को पोषण देता हूँ। सूर्य का तेज भी मेरा ही है।
हम अक्सर सुख में ईश्वर को भूल जाते हैं और मुश्किल आने पर उन्हें याद करते हैं। मानो ईश्वर केवल मुश्किल के समय ही याद करने के लिए हों!
लेकिन सच्ची भक्ति वह है कि सुख में अहंकार न आए और दुख में श्रद्धा न टूटे। एक व्यक्ति को अचानक बड़ा व्यावसायिक लाभ होता है। वह अपनी बुद्धि और मेहनत की ही महिमा गाने लगता है। लेकिन जब मुश्किल आती है तब उसे समझ आता है कि जीवन में हर बात केवल हमारे नियंत्रण में नहीं है।
मेहनत करना हमारे हाथ में है, लेकिन हर परिणाम को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है। ईश्वर को केवल मुश्किल में याद करना श्रद्धा की शुरुआत है, लेकिन हर परिस्थिति में उनकी उपस्थिति का अनुभव करना आध्यात्मिक जागृति है।
सबसे बड़ा अंधकार अज्ञान का है!
हम दूसरों की गलतियां तुरंत देख लेते हैं, लेकिन अपने अंदर मौजूद मोह, अहंकार और स्वार्थ को पहचान नहीं पाते।
दूसरों की संपत्ति देखकर ईर्ष्या होती है, दूसरों की सफलता देखकर दुख होता है और कोई हमसे आगे निकल जाए तो मन में असंतोष पैदा होता है। लेकिन क्या कभी खुद से पूछते हैं कि मैं जो पाने के लिए दौड़ रहा हूँ, वह सच में मेरी जरूरत है या केवल मेरी इच्छा?
यही प्रश्न हमें आत्मचिंतन की ओर ले जाता है। हम पूरी जिंदगी वृक्ष के पत्तों को पानी पिलाते हैं, लेकिन जड़ों को भूल जाते हैं। जब वृक्ष को सचमुच हरा-भरा रखना हो तो पानी जड़ों में डालना पड़ता है। उसी तरह केवल बाहरी सफलता, संपत्ति और प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ने से जीवन में सच्ची शांति नहीं मिलती। आंतरिक चेतना और परमात्मा के साथ जुड़ाव ही जीवन को सही दिशा देता है।
जो अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता, वह दुनिया जीतकर भी अंदर से पराजित ही रहता है।
डालियों को नहीं, जड़ों को पहचानें!
पुरुषोत्तम योग हमें जीवन के तीन महत्त्वपूर्ण सत्य समझाता है:
जो नाशवान है उसे स्थायी मानकर अहंकार न करना।
शरीर से अलग रहने वाली अविनाशी आत्मा को पहचानना।
संपूर्ण सृष्टि के सर्वोच्च आधार स्वरूप परमात्मा के साथ जुड़ना।
जीवन में सब कुछ पाएं, लेकिन सब कुछ अपना है ऐसा मोह न रखें। रिश्ते निभाएं, लेकिन अपेक्षाओं में अपनी शांति न खोएं। सफलता प्राप्त करें, लेकिन अहंकार में अपनी पहचान न भूलें।
क्योंकि एक दिन पद, पैसा, प्रतिष्ठा और भौतिक सुख सब पीछे रह जाएगा। तब आपके साथ क्या जाएगा?
आपके कर्म और आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा!
संसार की डालियों पर जीवन बिताना आसान है, लेकिन अपने अस्तित्व की जड़ों तक पहुंचना ही सच्ची आध्यात्मिक सिद्धि है।
यही पुरुषोत्तम योग का अमूल्य संदेश है!
क्रमशः…
आगामी अध्याय १६ (दैवासुर संपद् विभाग योग) में हम जानेंगे:
“मनुष्य के अंदर ही देवत्व और आसुरी वृत्तियों का संघर्ष क्यों चलता है? अभय, सत्य, दया और विनम्रता जैसे दैवी गुण हमें उन्नति की ओर कैसे ले जाते हैं? और अहंकार, क्रोध, दंभ तथा लोभ जैसी आसुरी वृत्तियां मनुष्य के पतन का कारण कैसे बनती हैं?”
दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट, नेशनल अवार्ड से सम्मानित) स्पोर्ट्स टीचर।

