इंसान जन्म से निर्दोष होता है, तो फिर गुनहगार कौन बनाता है? समाज, राजनीति और पुलिस तंत्र की विफलता पर गंभीर सवाल
क्या कड़े कानूनी सुधारों से राजनीति से गुंडागर्दी को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है?
आज समाज में दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे अपराधों और गुंडागर्दी को देखकर हर नागरिक के मन में एक ही सवाल उठता है कि ये अपराधी कहाँ से आते हैं? क्या कोई भी व्यक्ति जन्म से ही अपराधी होता है? ‘महानगर मेट्रो’ के इस विशेष आलेख में इसी सवाल का जवाब तलाशने का प्रयास किया गया है। विशेषज्ञों और वास्तविक परिस्थितियों से यह स्पष्ट होता है कि गुंडे कभी भी जन्मजात अपराधी नहीं होते, बल्कि आसपास की परिस्थितियाँ, हालात और व्यवस्थागत विफलताएँ उन्हें आपराधिक दुनिया की तरफ धकेलती हैं। “गुंडे पैदा नहीं होते, बल्कि उन्हें पैदा किया जाता है” – यह कथन सौ फीसदी सच है, क्योंकि इंसान जन्म से निर्दोष होता है, लेकिन समाज, राजनीति और पुलिस तंत्र की कमियाँ उसे गुनहगार बनने पर मजबूर कर देती हैं।
इन तीनों मुख्य कारकों की विस्तृत समीक्षा निम्नलिखित है:
- समाज की भूमिका: अपराधी पैदा करने वाला कारखाना?
समाज व्यक्ति का निर्माण करने वाला पहला स्थान है। यदि समाज में ही असंतुलन पैदा हो जाए, तो वह अपराधियों को जन्म देने वाला कारखाना बन जाता है।
आर्थिक असमानता और गरीबी: बुनियादी जरूरतों (रोटी, कपड़ा, मकान) को पूरा करने में असफल रहने वाले कुछ युवा जल्दी पैसे कमाने के शॉर्टकट के रूप में अपराध के रास्ते पर चल पड़ते हैं।
पारिवारिक उपेक्षा और हिंसा: बचपन में उचित संस्कारों, प्रेम या मार्गदर्शन का अभाव, अथवा घरेलू हिंसा का शिकार हुए बच्चों के मानस पर गहरी नकारात्मक असर पड़ती है।
सामाजिक भेदभाव: जातिवाद, बेरोजगारी और सामाजिक बहिष्कार के कारण युवाओं में व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश भर जाता है, जो अक्सर हिंसक रूप धारण कर लेता है।
- राजनीति की भूमिका: अपराधियों को संरक्षण देने वाली ढाल
राजनीति देश की दिशा तय करती है, लेकिन जब राजनीति स्वार्थी हो जाती है तो वह अपराध को सीधा बढ़ावा देती है।
राजनीति का अपराधीकरण: चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल बाहुबलियों और अपराधियों की मदद लेते हैं। बदले में इन अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है।
अपराधियों को प्रोत्साहन: अपराधियों को टिकट देना, उन्हें बड़े पदों पर बैठाना या सम्मानित करना उनका मनोबल बढ़ाता है और वे खुद को कानून से ऊपर मानने लगते हैं।
युवाओं का दुरुपयोग: राजनेता अपने स्वार्थ के लिए बेरोजगार युवाओं को ‘गैंगस्टर’ या ‘पार्टी कार्यकर्ता’ के रूप में इस्तेमाल कर उन्हें अपराध की आग में झोंक देते हैं।
- पुलिस विभाग की भूमिका: विफलता या भ्रष्टाचार की मिलीभगत?
पुलिस तंत्र कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है, लेकिन उसकी विफलता या भ्रष्टाचार अपराध को पनपने में मदद करता है।
भ्रष्टाचार और साठगांठ: जब पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार प्रवेश करता है और अपराधियों के साथ पुलिस की मिलीभगत होती है, तब अपराधी बेखौफ हो जाते हैं।
कानून के डर का अभाव: जाँच में देरी, सबूतों की कमी या कानूनी पेचीदगियों के कारण अपराधियों को सजा मिलने में देरी होती है, जिससे कानून का डर कम हो जाता है।
आम नागरिकों के प्रति उदासीनता: पुलिस द्वारा समय पर शिकायतें न सुनना या छोटे अपराधों पर ध्यान न देना अपराधियों को और बड़े अपराध करने के लिए प्रेरित करता है।
निष्कर्ष और बड़ा सवाल:
अपराध को खत्म करना है तो केवल अपराधियों को सजा देना काफी नहीं है। जब तक समाज में समानता नहीं आएगी, राजनीति से अपराध दूर नहीं होगा और पुलिस तंत्र निष्पक्ष तथा पारदर्शी नहीं बनेगा, तब तक समाज ऐसे अनगिनत गुंडे पैदा करता रहेगा।

