गांधीनगर। गुजरात के विकास के दावों के बीच राज्य की स्थानीय स्वशासन संस्थाएं भारी आर्थिक संकट और वित्तीय संकट के दुष्चक्र में फंस गई हैं। जनता को प्राथमिक सुविधाएं प्रदान करने वाली ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं की आर्थिक स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है, जिसका ज्वलंत उदाहरण बकाया पानी के जुर्माने और करों के करोड़ों रुपये के आंकड़ों से सामने आया है।
ग्राम पंचायतों पर 236 करोड़ से अधिक का जल कर का कर्ज
राज्य के ग्रामीण इलाकों में घर-घर पीने का पानी पहुंचाने वाली ग्राम पंचायतें खुद ही अब कर्ज के पहाड़ के नीचे दब गई हैं। प्राप्त सही जानकारी के अनुसार, राज्य की विभिन्न ग्राम पंचायतों का जल आपूर्ति विभाग और संबंधित बोर्ड को चुकाए जाने वाले जल कर का बकाया 236 करोड़ के आंकड़े को भी पार कर गया है। ग्राम स्तर पर कर की कमजोर वसूली, अपर्याप्त सरकारी अनुदान और बिजली बिल सहित बढ़ते खर्चों के कारण पंचायतें अपने प्राथमिक बिल भी चुकाने की स्थिति में नहीं रही हैं।
152 नगर पालिकाओं पर भी 148 करोड़ से अधिक का बोझ
दूसरी ओर, राज्य की शहरी स्थानीय स्वशासन संस्थाओं यानी नगर पालिकाओं की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। राज्य की लगभग 152 नगर पालिकाओं पर 148 करोड़ से अधिक का पानी का बिल बकाया है। नगर पालिकाओं द्वारा स्थानीय निवासियों से जल कर उचित रूप से वसूलने में विफलता और आय के सीमित स्रोतों के कारण जल आपूर्ति बोर्ड के बिल चुकाने में भारी मुश्किलें आ रही हैं। बोटाद, अंजार, पाटण और पालनपुर जैसी बड़ी नगर पालिकाओं पर करोड़ों रुपये के पानी बिल का बकाया चढ़ गया है।
सरकारी अनुदान और ऋण से काम चलाने का प्रयास
स्थानीय स्वशासन की ये संस्थाएं अपना दैनिक प्रशासन चलाने और कर्मचारियों का वेतन देने के लिए भी सरकारी ऋण या विशेष अनुदान पर निर्भर हो गई हैं। बकाया राशि न भरे जाने के कारण जल आपूर्ति विभाग पर भी आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। यदि समय पर कर वसूली की सख्त नीति नहीं अपनाई गई और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के वित्तीय ढांचे में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में जनता को दी जाने वाली पीने के पानी और सफाई जैसी प्राथमिक सुविधाओं पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है।

