छोटाउदेपुर सिविल हॉस्पिटल में डॉक्टरों की लंबे समय से चली आ रही गड़बड़ी और इलाज के लिए घंटों इंतज़ार करने वाले गरीब मरीज़ों की बुरी हालत के बारे में मीडिया रिपोर्ट छपते ही हेल्थ सिस्टम एक झटके में जागा। रिपोर्ट के तुरंत बाद, हॉस्पिटल की हालत में अचानक सुधार देखा गया और एक ही चैंबर में तीन डॉक्टर स्टाफ़ के साथ मरीज़ों की जांच करते दिखे।
जिस सिविल हॉस्पिटल में मरीज़ों को मामूली जांच के लिए भी घंटों लंबी लाइनों में खड़ा रहना पड़ता था, वहां मीडिया के कैमरों और रिपोर्ट के असर से सिस्टम तुरंत एक्शन मोड में आ गया है। हालांकि, इस सुधार के साथ ही सिस्टम के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जनता के तीखे सवाल – कौन लेगा ज़िम्मेदारी?
जनता के ज़रूरी सवालों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
सिर्फ़ कैमरे के सामने ही एक्टिविज़्म क्यों? अगर डॉक्टर मीडिया रिपोर्ट के बाद आ सकते हैं, तो पिछली बार मरीज़ों की शिकायतों के समय सिस्टम सोया क्यों था?
परमानेंट सिस्टम या सिर्फ़ दिखावा? क्या यह सुधार सिर्फ़ रिपोर्ट वाले दिन तक ही रहेगा या रोज़ का सिस्टम बन जाएगा?
आउटपेशेंट का क्या? दूर-दराज़ के गांवों से किराया देकर आने वाले गरीब मरीज़ों को समय पर इलाज की गारंटी परमानेंटली कौन देगा?
सरकारी अस्पताल जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं। मरीज़ों को सही और समय पर इलाज देना सिस्टम का पहला काम है, कोई एहसान नहीं। अगर एक रिपोर्ट रातों-रात सिस्टम बदल सकती है, तो पहले सिस्टम में इतनी कड़ी मॉनिटरिंग क्यों नहीं थी?
महानगर मेट्रो न्यूज़ से सीधा सवाल: क्या बड़े अधिकारी ऐसे सिस्टम के खिलाफ़ कोई परमानेंट और सख्त एक्शन लेंगे जो सिर्फ़ खबर छपने पर सुधरता है?
इमरान मिर्ज़ा

