जब सफलता के पीछे छिपी दिव्य शक्ति की पहचान होती है!
संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ, सुंदर, शक्तिशाली और अद्भुत है, उसमें परमात्मा की ही एक झलक विराजमान है।
गीता के 9 वें अध्याय में हमने देखा कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए धन, रूप-रंग या किसी बड़ी योग्यता की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता है तो केवल शुद्ध भाव और अनन्य शरणागति की।
अब अर्जुन के मन में एक नया जिज्ञासापूर्ण प्रश्न उठता है:
हे कृष्ण! यदि आप वास्तव में पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, तो मैं आपको कैसे पहचानूँ? इस संसार के पदार्थों, घटनाओं और दैनिक जीवन में आपकी उपस्थिति मुझे कहाँ-कहाँ देखने को मिलेगी?”
अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर में श्रीकृष्ण अपनी दिव्य क्षमताओं का खजाना खोलते हैं। इस अध्याय का नाम है “विभूति योग”, अर्थात् परमात्मा की असाधारण महिमा और दिव्य शक्तियों को पहचानने का सुंदर समन्वय।
विभूति क्या है? ईश्वर का ‘GPS Location’
विभूति” का सरल अर्थ है असाधारण महिमा, दिव्य शक्ति या ऐसा उत्कृष्ट सामर्थ्य जो किसी भी क्षेत्र की श्रेष्ठता के शिखर में छिपा होता है।
आज के डिजिटल युग में जैसे हम किसी अनजान शहर में रास्ता खोजने के लिए GPS का उपयोग करते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण हमें इस संसार में ईश्वर को खोजने का आत्मिक GPS देते हैं।
जो-जो भी प्रभावशाली, कांतिमान और शक्तिशाली वस्तु या गुण हैं, उन सबको तुम मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुआ समझो।
जैसे स्मार्टफोन में कई एप्लिकेशन चलती हैं लेकिन पीछे पूरे सिस्टम को पावर देने वाली बैटरी एक ही होती है, वैसे ही हमारे जीवन में अद्भुत बुद्धि, संगीत में अद्वितीयता, साहस या सेवा जैसे गुण दिखाई देते हैं, उन सबके पीछे का मूल ‘Power-Source’ परमात्मा ही हैं।
“मैं कर रहा हूँ” से “मेरे द्वारा हो रहा है” तक
इस अध्याय का सबसे बड़ा आध्यात्मिक पाठ है — सफलता मिलने पर अहंकार न करना और असफलता मिलने पर पूरी तरह से टूट न जाना।
एक खिलाड़ी जब मैदान में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है, तो उसके पीछे उसकी कठिन मेहनत, कोच का मार्गदर्शन, परिवार का सहयोग, शरीर की क्षमता और अवसर होता है।
यदि सफलता के बाद खिलाड़ी कहता है कि “यह सब केवल मैंने किया”, तो अहंकार जन्म लेता है।
लेकिन यदि वह कहता है कि “मैंने अपनी पूरी मेहनत की; मुझे मिली शक्ति और अवसर के लिए मैं ईश्वर का आभारी हूँ”, तो वह खेल ही साधना बन जाता है।
सफलता अहंकार का कारण बनती है तब मनुष्य ऊँचा दिखाई देता है, लेकिन कृतज्ञता आने पर मनुष्य वास्तव में ऊँचा बनता है।
संसार के ‘Best Performance’ के पीछे की दिव्य ऊर्जा
श्रीकृष्ण कहते हैं:
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते” (मैं ही सभी का स्रोत हूँ)।
वे अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक क्षेत्र में जो भी श्रेष्ठ है, वह मैं ही हूँ:
सूर्य में प्रकाश, नक्षत्रों में चंद्रमा, अचल वस्तुओं में हिमालय और नदियों में पवित्र गंगा।
वेदों में सामवेद, देवों में इंद्र और शब्दों में अक्षर ‘ओम्’।
वृक्षों में पवित्र पीपल और घोड़ों में श्रेष्ठ उच्चैःश्रवा।
“मैं शस्त्रधारियों में भगवान श्रीराम हूँ और पांडवों में धनुर्धारी अर्जुन हूँ।”
“मैं विजेताओं की विजय-नीति हूँ।”
जब एक खिलाड़ी अपनी प्रतिभा को ईश्वरीय उपहार मानता है, तो पदक (मेडल) केवल गले का आभूषण नहीं रह जाता, बल्कि हृदय को नम्र बनाता है।
गले में मेडल पहनते हैं, लेकिन सच्ची जीत तो तब होती है जब जीत के बाद भी सिर झुका रहे।
आज के युग और शिक्षा में ‘विभूति योग’
सोशल मीडिया पर किसी महान खिलाड़ी, वैज्ञानिक या कलाकार को देखकर ईर्ष्या करने के बजाय उनमें विराजमान ‘विभूति’ से प्रेरणा लेनी चाहिए।
हर बच्चे के अंदर अलग क्षमता होती है — कोई पढ़ाई में, कोई खेल में, तो कोई कला में उत्तम होता है। सच्चे शिक्षक का काम केवल मार्कशीट बनाना नहीं है, बल्कि बच्चे में छिपी विभूति को पहचानना है।
एक अच्छा शिक्षक यह नहीं खोजता कि बच्चे को क्या नहीं आता; वह यह खोजता है कि बच्चे में क्या अद्भुत है।
अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण एक अद्भुत बात कहते हैं:
“हे अर्जुन! इस सबको विस्तार से जानने की तुम्हें क्या आवश्यकता है? मैं तो अपने एक ही अंश से इस पूरे ब्रह्मांड को धारण करके स्थित हूँ!”
पूरा ब्रह्मांड, करोड़ों आकाशगंगाएँ (Galaxies) और पृथ्वी पर जीवन ईश्वर की अनंत शक्ति के केवल एक छोटे से अंश पर चल रहा है!
इसलिए ईर्ष्या छोड़िए, प्रेरणा लीजिए। दूसरों की सफलता देखकर जलिये मत, बल्कि उनमें विराजमान ईश्वरीय गुण को प्रणाम कीजिए।
प्रतिभा \ अहंकार \ पतन की जगह प्रतिभा \ कृतज्ञता \सेवा , उन्नति का मार्ग चुनिए।
हमें भगवान को कहाँ खोजना है? भूखे को भोजन देने में जो करुणा है, निराश खिलाड़ी से यह कहने में कि “फिर से प्रयास करो… तुम कर सकते हो” जैसी आशा में — वहीं पर परमात्मा की विभूति है।
जब अपनी प्रतिभा के लिए अहंकार नहीं बल्कि कृतज्ञता आती है, तब विभूति योग केवल पढ़ने का अध्याय नहीं रह जाता; वह जीवन जीने की दिव्य दृष्टि बन जाता है।
आगामी अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग
आगे हम जानेंगे: “यदि पूरा ब्रह्मांड ही कृष्ण की विभूति है, तो अर्जुन को जब श्रीकृष्ण ने अपना विराट विश्वरूप दिखाया तो उसने क्या देखा? और उस दिव्य दर्शन ने अर्जुन के समग्र जीवन-दर्शन को किस प्रकार बदल दिया?”
दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर

