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श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंखला: अध्याय – ९ (राजविद्या राजगुह्य योग) : अनन्य शरणागति: अतीत के बोझ से मुक्ति और ईश्वरीय कवच

भगवान को पाने के लिए पात्रता की नहीं, बल्कि केवल शुद्ध भाव की आवश्यकता है। दुनिया शायद आपकी जेब की हैसियत देखेगी, लेकिन ईश्वर हमेशा आपके हृदय की पवित्रता देखते हैं।

गीता के पिछले अध्याय (अध्याय ८) में हमने देखा कि जीवन की ‘अंतिम ओवर’ में बैकग्राउंड ऐप की तरह ईश्वर के स्मरण से मन को कैसे स्थिर रखा जाए। लेकिन अर्जुन के मन में अभी भी एक सवाल है—”कृष्ण, ऐसा कौन सा राजमार्ग है जिस पर चलने से इस संसार में रहते हुए भी आपकी परम शांति का अनुभव हो?”

अर्जुन बिना किसी कपट के, एकदम निष्छल और जिज्ञासु हैं, इसलिए कृष्ण इस ९वें अध्याय में ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य प्रकट करते हैं। इस अध्याय का नाम है ‘राजविद्या राजगुह्य योग’यानी विद्याओं का राजा और रहस्यों का महा-रहस्य!

राजविद्या: परमात्मा का ‘Open-Source’ कोड

आज के जमाने में कोई बड़ी कंपनी या वैज्ञानिक अपना फार्मूला या सीक्रेट कोड किसी को नहीं देता। लेकिन कृष्ण यहाँ पूरे ब्रह्मांड को चलाने वाला सीक्रेट कोड अर्जुन को (और हम सभी को) खुलेआम दे रहे हैं।

कृष्ण कहते हैं कि यह ज्ञान सर्वोच्च पवित्र है और इसका अनुभव आप प्रत्यक्ष रूप से कर सकते हैं। यह कोई केवल थ्योरी (सिद्धांत) नहीं है, बल्कि प्रैक्टिकल लाइफ साइंस (व्यावहारिक जीवन विज्ञान) है।

जैसे आज के समय में Cloud Computing (जैसे Google Cloud या iCloud) में करोड़ों यूज़र्स का डेटा सुरक्षित रहता है। वह डेटा कहीं हवा या स्पेस में सेव्ड (सहेजा हुआ) है, लेकिन क्लाउड खुद उस डेटा से लिप्त नहीं होता और न ही डेटा क्लाउड पर बोझ बनता है।

ठीक उसी तरह, कृष्ण कहते हैं: “यह पूरा जगत मेरे द्वारा ही विस्तारित है। सभी जीव मुझमें स्थित हैं, लेकिन मैं उनमें (या उनके कर्मों के बंधन में) बंधा हुआ नहीं हूँ। जैसे पवन सदैव आकाश में ही बहती है पर आकाश पवन से मुक्त रहता है, वैसे ही ईश्वर सृष्टि के कण-कण में होने के बावजूद इस संसार की मोह-माया से अलिप्त हैं।”

ईश्वर की ‘Management System’ (CEO of the Universe)

हम अक्सर भ्रमित हो जाते हैं कि इस दुनिया में इतनी बड़ी व्यवस्था इतनी परफेक्ट कैसे चलती है? सूर्य रोज़ सुबह क्यों उगता है? ऋतुएँ क्यों बदलती हैं?
कृष्ण यहाँ अपनी प्रबंधन भूमिका (Management Role) के बारे में बात करते हैं:

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। (मेरी अध्यक्षता में ही प्रकृति इस चराचर जगत की रचना करती है।)

किसी बड़ी आईटी (IT) कंपनी के CEO खुद बैठकर कोडिंग नहीं करते और न ही ग्राउंड लेवल पर एक-एक वायर जोड़ते हैं। उनका काम है विज़न देना और सिस्टम सेट करना। उनकी उपस्थिति और गाइडलाइन्स से ही पूरी कंपनी ऑटोमैटिक मोड पर चलती है। बस, कृष्ण भी इस ब्रह्मांड के ऐसे ही ‘Super CEO’हैं। उनकी सत्ता (Energy) से ही प्रकृति अपना काम पूरी तरह से ऑटोमेटेड मोड पर करती है।

“पत्रं पुष्पं फलं तोयम्” भगवान का बजट-फ्रेंडली लाइक बटन!

इस अध्याय का सबसे सुंदर और हृदयस्पर्शी श्लोक यह है। सामान्यतः हमें लगता है कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए बहुत बड़े यज्ञ, महंगे भोग या लाखों रुपये का दान-पुण्य करना पड़ेगा। लेकिन कृष्ण इस भ्रम को एक ही झटके में तोड़ देते हैं।

कृष्ण कहते हैं:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति… (जो कोई प्रेम और भक्ति से मुझे एक पत्ता, एक फूल, एक फल या केवल थोड़ा सा जल भी अर्पित करता है, मैं उसके उस प्रेमपूर्वक दिए गए उपहार को स्वीकार करता हूँ।)

जैसे एक छोटा बच्चा अपने पिता के जन्मदिन पर अपनी गुल्लक (Piggy Bank) में से १० रुपये निकालकर एक साधारण गुलाब का फूल दे, तो पिता के लिए करोड़ों रुपये के उपहार से भी ज़्यादा कीमती वह १० रुपये का फूल होता है, क्योंकि उसमें उस बच्चे का भाव छिपा है। कृष्ण भी हमारे वही पिता हैं। उन्हें आपके ‘उपहार की कीमत’ नहीं चाहिए, उन्हें आपका ‘भाव’ चाहिए।

ईश्वरीय कवच: “योगक्षेमं वहाम्यहम्”

आज के समय में हम भविष्य की चिंता में मेडिक्लेम या लाइफ इंश्योरेंस करवाते हैं। लेकिन कृष्ण इस अध्याय में दुनिया की सबसे बेस्ट सुरक्षा पॉलिसी देते हैं, जिसका प्रीमियम है ‘अनन्य भक्ति’। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

वे कहते हैं कि: “जो मनुष्य अनन्य भाव से (यानी किसी अन्य विकल्प के बिना, पूर्ण विश्वास के साथ) मेरा चिंतन करते हैं, उन सदैव मुझमें एकीकृत भक्तों के योग और क्षेम (सुख-सुविधा और सुरक्षा) की ज़िम्मेदारी मैं स्वयं उठाता हूँ!”

योग: जो आपके पास नहीं है, उसे लाकर देना (आवश्यकता पूरी करना)।
क्षेम: जो आपके पास पहले से है, उसकी रक्षा करना (सुरक्षा प्रदान करना)।

जब आप किसी के विशेष अतिथि बनते हैं, तो वह मेज़बान एयरपोर्ट पर गाड़ी भेजने से लेकर आपके रहने और खाने की पूरी व्यवस्था खुद करता है; आपको कोई चिंता नहीं करनी पड़ती। ठीक वैसे ही, जब आप कृष्ण से जुड़ते हैं, तो इस पूरे ब्रह्मांड का स्वामी आपकी ज़िंदगी का पर्सनल केयरटेकर बन जाता है!

अतीत के बोझ से मुक्ति: नो-रेज़िग्नेशन पॉलिसी!

कृष्ण यहाँ एक बहुत बड़ा और ढांढस बँधाने वाला बयान देते हैं, जो आज के डिप्रेशन और अपराध-बोध (Guilt) से जूझ रहे लोगों के लिए संजीवनी के समान है। कृष्ण कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अतीत में कितना भी बुरा (दुराचारी) क्यों न रहा हो, लेकिन यदि वह आज सच्चे दिल से सुधरकर मुझे समर्पित हो जाता है, तो उसे भी साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसका संकल्प सही है।

भगवान किसी को रिजेक्ट नहीं करते। उनके यहाँ किसी गलती के कारण स्थायी ‘फायर’ (नौकरी से निकालना) नहीं किया जाता। यहाँ कभी भी रि-जॉइनिंग संभव है! क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥ (वह अति शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है और परम शांति को प्राप्त करता है। हे अर्जुन! तुम प्रतिज्ञापूर्वक निश्चय जानो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता।)

मुख्य जीवन सूत्र (Key Takeaways):

कर्म को भक्ति बनाएं: कृष्ण कहते हैं कि तुम जो खाते हो, जो दान करते हो, जो तप करते हो, वह सब मुझे अर्पित कर दो। इसका अर्थ है कि ऑफिस की फाइल सबमिट करते समय या मैदान में खेलते समय भी मन में यह भाव रखें कि “कृष्ण, यह आपके लिए है।” ऐसा करने से काम का तनाव गायब हो जाएगा और काम ही भक्ति बन जाएगा।

भक्ति ही आपका पासपोर्ट है: आप किस बैकग्राउंड से आते हैं, आपकी शिक्षा कितनी है, आपके पास कितना पैसा है—इन बातों से ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड़ता। आपकी भक्ति ही आपका पासपोर्ट है।

अतीत को भूलकर आगे बढ़ें: यदि अतीत में कोई भूल हो गई हो, तो रोज़ उसका अफ़सोस करके वर्तमान को बिगाड़ने के बजाय, आज से ही सही रास्ते पर चलना शुरू करें। कृष्ण का वादा है कि उनका भक्त कभी डूबता नहीं है।

जब हम अपनी कुशलता, अपना खेल और अपना पूरा जीवन सच्चे भाव से परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तब हमारा लाइफ-मैनेजमेंट एकदम परफेक्ट हो जाता है!

(क्रमश: आगामी अध्याय १० में हम समझेंगे ‘विभूति योग’— भगवान की एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी सुपरपावर्स कहाँ-कहाँ छिपी हैं? और जगत् के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (Best Performance) के पीछे कौन सी दिव्य ऊर्जा काम करती है?)

दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर

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