Homeआर्टिकलश्रीमद्भगवद्गीता श्रृंखला: अध्याय - 8 (अक्षरब्रह्म योग)

श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंखला: अध्याय – 8 (अक्षरब्रह्म योग)

अल्टीमेट टाइम मैनेजमेंट: समय की गणना और जीवन के अंतिम ओवर में छक्का मारने की कला

मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि यात्रा का एक पड़ाव (विराम) है। आपकी पूरी जिंदगी का अभ्यास (प्रैक्टिस) कैसा था, इसका असली टेस्ट जीवन के अंतिम क्षण में ही होता है।

पिछले अध्याय (अध्याय 7) में कृष्ण ने हमें पूरी सृष्टि का हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर (अपरा और परा प्रकृति) समझाया था। लेकिन अर्जुन तो एक प्रोफेशनल आर्चर (तीरंदाज) थे, उनका दिमाग बहुत प्रैक्टिकल था। उन्होंने कृष्ण से 7 बहुत ही कठिन तकनीकी सवाल पूछे: “ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण… जब इंसान इस दुनिया को छोड़कर जा रहा हो (अंतकाल में), तब वह आपको कैसे याद रख सकता है?”

यह सुनकर श्री कृष्ण एक बेहतरीन ‘लाइफ कोच’ और ‘टाइम मैनेजर’ बनकर अर्जुन को जो गूढ़ ज्ञान देते हैं, उसे गीता में ‘अक्षरब्रह्म योग’ कहा जाता है। ‘अक्षर’ का अर्थ है जिसका कभी नाश नहीं होता।अर्थ:मनुष्य अंत समय में (मृत्यु के वक्त) जिस वस्तु, व्यक्ति या विचार का चिंतन करते हुए शरीर छोड़ता है, वह अगले जन्म में उसी योनि या स्थिति को प्राप्त होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि पूरी जिंदगी हम जिसमें डूबे रहे होते हैं, आखिरी क्षण में हमारा सबकॉन्शियस माइंड (अवचेतन मन) उसी विचार को बाहर लाता है।

कोई क्रिकेटर पूरी मैच में चाहे कितना भी अच्छा खेला हो, लेकिन अगर आखिरी ओवर की आखिरी गेंद पर छक्का मारने की जरूरत हो और वहां वह नर्वस होकर आउट हो जाए, तो मैच हाथ से निकल जाता है। जीवन का आखिरी क्षण भी वैसा ही ‘अंतिम ओवर’ है। उस आखिरी ओवर में आपका माइंडसेट कैसा है, इसी पर आपकी आगे की पूरी यात्रा (मैच) टिकी है।

“अंतिम ओवर” की बेस्ट प्रैक्टिस कैसे करें?

अब अर्जुन को चिंता हुई “कृष्णा, अगर आखिरी क्षण में कोई दुर्घटना हो जाए, या किसी बीमारी में मन ठिकाने न हो, तो तुम्हें कैसे याद किया जाए? वह तो बहुत कठिन है!”

कृष्ण मुस्कुराए और इसका एक बहुत ही सुंदर और असरदार उपाय बताया:
इसलिए तुम हर समय मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो!

कृष्ण यह नहीं कह रहे हैं कि तुम अपना धनुष-बाण फेंककर हिमालय पर चले जाओ और 24 घंटे माला जपते रहो। वे कहते हैं कि युद्ध भी करो और मुझे याद भी रखो।

जब आप अपने स्मार्टफोन में गूगल मैप्स या म्यूजिक प्लेयर चालू करते हैं, तब स्क्रीन पर भले ही आप कोई दूसरा काम (जैसे व्हाट्सएप या गेम) कर रहे हों, लेकिन वह म्यूजिक या मैप Background App के रूप में पीछे लगातार चलता ही रहता है।

कृष्ण ने भी हमसे बस यही करने को कहा है। हमारा शरीर मैदान पर खेले, ऑफिस में काम करे, या घर की जिम्मेदारियां निभाए (यह हमारी Foreground App है), लेकिन मन के अंदर ईश्वर के प्रति सच्चा भाव ‘बैकग्राउंड ऐप’ की तरह 24 घंटे एक्टिव रहना चाहिए। अगर पूरी जिंदगी यह बैकग्राउंड ऐप चालू रहेगा, तो अंतिम समय में यह ऑटोमैटिक सामने आ ही जाएगा!

समय का चक्र: आधुनिक विज्ञान भी हैरान है

इस अध्याय में कृष्ण स्पेस (अंतरिक्ष) और टाइम (समय) की जो गणना देते हैं, उसे सुनकर आज के आधुनिक वैज्ञानिक भी चकित रह जाते हैं। कृष्ण ब्रह्मा जी के एक दिन की गणना समझाते हैं

ब्रह्मा जी का 1 दिन = 432 करोड़ मानव वर्ष।
ब्रह्मा जी की 1 रात = 432 करोड़ मानव वर्ष!

जब ब्रह्मा जी का दिन उगता है तब सारी सृष्टि दृश्यमान (प्रकट) होती है, और रात होने पर सब कुछ वापस लीन हो जाता है। कृष्ण समझाते हैं कि समय का यह चक्र निरंतर चलता रहता है। इन अरबों वर्षों के सामने हमारा 70-80 साल का यह मनुष्य जीवन कितना छोटा है! जब हम ब्रह्मांड के इस विशाल टाइम स्केल (समय चक्र) को समझते हैं, तब हमारी छोटी-छोटी चिंताएं, अहंकार और परेशानियां बिल्कुल मामूली लगने लगती हैं।

दो ब्रह्मांडीय मार्ग

अध्याय के अंत में कृष्ण शरीर छोड़ने के दो मार्गों के बारे में बात करते हैं.

  1. शुक्ल गति (प्रकाश का मार्ग):जो योगी अग्नि, प्रकाश, दिन और उत्तरायण के 6 महीनों के दौरान शरीर छोड़ते हैं, वे ब्रह्म को प्राप्त करते हैं और फिर जन्म-मरण के चक्र में वापस नहीं आते।
  2. कृष्ण गति (अंधकार का मार्ग):जो धुएं, रात्रि और दक्षिणायन के 6 महीनों में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे चंद्रलोक के सुखों को भोगकर वापस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।

यह केवल किसी कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं! ‘उत्तरायण और प्रकाश’ का अर्थ है जागरूकता, ज्ञान और विवेक से भरी अवस्था। जबकि ‘दक्षिणायन और अंधकार’ का अर्थ है मोह, माया और अज्ञानता की अवस्था। हमें ज्ञान के प्रकाश में जीना है।

जीवन का टर्निंग पॉइंट

रोजाना नेट प्रैक्टिस जरूरी है:जैसे स्पोर्ट्स में फाइनल मैच के दिन सीधा परफॉर्म नहीं किया जा सकता, उसके लिए रोज नेट प्रैक्टिस करनी पड़ती है। वैसे ही, अगर जीवन के अंतिम क्षण को सुधारना है, तो आज के एक-एक मिनट को सही विचारों और सत्कर्मों से सजाना होगा।

काम ही पूजा है: कृष्ण का मंत्र बहुत साफ है—काम छोड़ना नहीं है, बल्कि काम करते समय ईश्वर को साथ रखना है। ईमानदारी से खेला गया प्रत्येक खेल और किया गया प्रत्येक कार्य ही सच्ची भक्ति है।

समय की कीमत समझें: यह ब्रह्मांड बहुत बड़ा है और हमारे पास समय बहुत सीमित है। बेकार की चिंताओं या नकारात्मकता में समय बर्बाद करने के बजाय प्रोडक्टिव और आध्यात्मिक ग्रोथ पर फोकस करें।

क्षण-क्षण का सदुपयोग:समय को जीतने का एक ही रास्ता है हर पल को अर्थपूर्ण बनाना। अंतिम क्षण में भगवान याद आएं, इसके लिए पूरे जीवन भगवान को भूलना नहीं है।

डर का सही ठिकाना:मृत्यु से डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि गलत जीवन जीने से डरने की जरूरत है।
पहले बॉल से सजगता:जिंदगी का आखिरी ओवर सफल बनाने के लिए पहली गेंद से ही सजग (अवेयर) हो जाइए। हर दिन को ऐसे जिएं कि अगर आज जीवन का आखिरी दिन हो, तो भी कोई मलाल (अफसोस) न रहे।

सफल जीवन वह नहीं है जिसमें केवल संपत्ति इकट्ठी की जाए। सफल जीवन वह है जिसमें अंतिम क्षण में मन शांत हो, हृदय निर्मल हो और भगवान के प्रति अटूट विश्वास हो।

आइए, आज से ही हर दिन को प्रार्थना, सेवा, सत्य और प्रेम के साथ जिएं। क्योंकि अंतिम क्षण कब आएगा यह हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन उस क्षण तक कैसे जीना है, यह पूरी तरह से हमारे हाथ में है।

दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments