गांधीनगर/नई दिल्ली : देश में सब कुछ “परफेक्ट” चल रहा है। रामराज्य सचमुच धरती पर उतर आया है। देश में अब करप्शन जैसा कोई शब्द नहीं बचा, बेरोज़गारी और महंगाई शायद पुरानी बातें हो गई हैं। सड़कें इतनी मजबूत हैं कि यूरोप भी शर्मिंदा हो जाए। हमारे हेल्थ सिस्टम की पूरी दुनिया में मार पड़ रही है और दुनिया भर के देश और नेता प्रधानमंत्री के कहने पर ही अपना घर चलाते हैं! चारों दिशाओं में सिर्फ और सिर्फ डेवलपमेंट की ज़बरदस्त रफ़्तार है।
लेकिन, इस देश में कुछ “इंटेलिजेंट” लोग ऐसे भी हैं जो सोने की धरती श्रीलंका जैसे देश में भी गलत सवाल उठाकर शांति भंग कर रहे हैं!
“सब चंगा सी”: सवाल पूछने वाला हर कोई गलत है!
अगर हमारे इस महान सिस्टम में कुछ भी गलत होता है, तो उसके लिए सरकार कभी ज़िम्मेदार नहीं हो सकती। क्योंकि सरकार पवित्र और मासूम है!
खुदकुशी करने वाले स्टूडेंट्स ही दोषी हैं: अगर NEET जैसे आम एग्जाम के पेपर बार-बार लीक होते हैं, लाखों स्टूडेंट्स का भविष्य खतरे में पड़ता है और कुछ स्टूडेंट्स फ्रस्ट्रेशन में सुसाइड कर लेते हैं, तो गलती स्टूडेंट्स की है। शायद वे सरकार को बदनाम करने के लिए सुसाइड कर रहे हैं!
विरोधी ही पेपर लीक करते हैं: अगर एग्जाम में कोई गड़बड़ी हुई है, तो वह विपक्ष ने ही की होगी। जो बेरोज़गारी की बात करता है वह देशद्रोही है, जो महंगाई पर चिल्लाता है उसे इकोनॉमिक्स नहीं आती और जो हॉस्पिटल में गलती निकालते हैं, उन्होंने शायद प्राइवेट हॉस्पिटल की फाइव-स्टार फैसिलिटी नहीं देखी होंगी!
सोनम वांगचुक में भी ‘अक्ल की कमी’: देश के महान साइंटिस्ट सोनम वांगचुक, जो लद्दाख बॉर्डर पर कड़ाके की ठंड में भूख हड़ताल पर हैं, उनमें भी पूरी तरह से अक्ल की कमी है। जब देश में इतना डेवलपमेंट हो रहा है, तो क्या इतनी छोटी-छोटी बातों के लिए उपवास करना ज़रूरी है?
सब्र की सच्ची मिसाल: हमारे आदरणीय शिक्षा मंत्री!
इस मुश्किल समय में अगर किसी की तारीफ़ करनी है, तो वह हमारे देश के शिक्षा मंत्री हैं। वे अद्भुत और बेमिसाल धैर्य की मिसाल हैं।
शांति से तमाशा देखने की अद्भुत कला: देश भर में करोड़ों युवा न्याय के लिए सड़कों पर चिल्ला रहे हैं, और पेपर लीक की नदी बह रही है, फिर भी वे बिना विचलित हुए शांति से सब कुछ देख रहे हैं।
क्या मंत्री की कोई ज़िम्मेदारी है? अरे भाई, पेपर लीक में बेचारे शिक्षा मंत्री का क्या दोष है? जब सब कुछ सुपर-परफेक्ट हो रहा है, तो जल्दबाजी में गलत काम करने की क्या ज़रूरत है? विरोधियों और विपक्ष को हमारे मंत्री से कुछ सीखना चाहिए जो इतनी शांति बनाए रखते हैं!
नई परिभाषा: जो ताली बजाए वह देशभक्त, जो सवाल पूछे वह देशद्रोही!
वह दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र में शासकों से सवाल पूछना भी सबसे बड़ा अपराध और देशद्रोह माना जाएगा।
आज के समय में सच्ची देशभक्ति यह नहीं है कि आप भ्रष्टाचार या पेपर लीक के खिलाफ आवाज़ उठाएं। सच्ची देशभक्ति तो यही है कि आप अपनी आँखें, कान और मुँह बंद करके अधिकारियों के खिलाफ़ ताली बजाएँ और ज़ोर से चिल्लाएँ, “सब ठीक है… सब ठीक है!”
प्रदर्शन करने वालों में समझदारी की बहुत कमी है। अगर उनमें समझ होती, तो वे भी आँखें बंद करके कहते कि भारत विश्व गुरु बन गया है और यहाँ कोई समस्या नहीं है। अब जनता को तय करना है कि देश को बर्बाद करने वाले सवाल पूछने हैं या चेहरे पर नकली मुस्कान के साथ ताली बजानी है, चाहे उनके दिल में कितना भी दर्द हो!

