Homeआर्टिकलईश्वर का सही पता कहाँ है? साइंस और स्पिरिचुअलिटी का अद्भुत समन्वय!

ईश्वर का सही पता कहाँ है? साइंस और स्पिरिचुअलिटी का अद्भुत समन्वय!

विज्ञान हमें बाहरी दुनिया के साधन देता है, लेकिन ज्ञान हमें आंतरिक शांति का मार्ग दिखाता है।

पिछले अध्याय में हमने देखा कि मन को वश में रखकर ‘आत्मसंयम’ कैसे विकसित किया जाए। डिजिटल युग के डिस्ट्रैक्शंस (ભટકાવ) के बीच भी खुद में स्थिर होना ही सच्चा योग है। लेकिन जब मन शांत होता है, तब भीतर से जिज्ञासा का एक नया दीपक जल उठता है
यह सृष्टि क्या है? भगवान कौन हैं? और वे कहाँ रहते हैं?

आज के मॉडर्न और लॉजिकल जमाने में हमें सब कुछ ‘प्रूफ’ (सबूत) के साथ चाहिए। हमें अंधविश्वास नहीं, लॉजिक चाहिए। अर्जुन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। इस साइंटिफिक माइंडसेट वाले अर्जुन को कृष्ण इस अध्याय में जो समझाते हैं, उसे आज हम ‘कॉस्मिक साइंस’ (Cosmic Science) कह सकते हैं।

आध्यात्मिकता और विज्ञान: एक ही सिक्के के दो पहलू

हम अक्सर यह मान लेते हैं कि विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के दुश्मन हैं। लेकिन कृष्ण साइंस के सबसे बड़े प्रोफेसर बनकर इस अध्याय में कहते हैं कि यह पूरी सृष्टि मेरी ही दो प्रकृतियों से बनी है:

  1. अपरा प्रकृति (जड़ विज्ञान): पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार। इन आठ तत्वों से हमारा शरीर और यह पूरी भौतिक सृष्टि (Physical Universe) बनी है, जिसे आज के वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं।
  2. परा प्रकृति (चेतन तत्व – Consciousness): यह वह ऊर्जा (Energy) है जो पूरी सृष्टि को चलाती है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था न कि ‘Energy can neither be created nor destroyed’ (ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है)। वही अविनाशी ऊर्जा यानी भगवान!
    आईफोन का सटीक उदाहरण: आप महंगे से महंगा और लेटेस्ट आईफोन (iPhone) खरीदें। उसमें बेस्ट प्रोसेसर, कैमरा और स्क्रीन है, वह सब ‘अपरा प्रकृति’ (हार्डवेयर) है। लेकिन अगर उसमें ‘सॉफ्टवेयर’ या ‘इंटरनेट कनेक्टिविटी’ ही न हो, तो वह फोन सिर्फ एक पत्थर का टुकड़ा है। उस फोन को जीवंत करने वाला सॉफ्टवेयर यानी ‘परा प्रकृति’। भगवान इस सृष्टि के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों के मेकर (निर्माता) हैं।

भगवान का सही पता कहाँ है?

कृष्ण मंदिरों में या आकाश के पार किसी सिंहासन पर ही नहीं बैठे हैं। वे प्रकृति के कण-कण में समाए हुए हैं। कृष्ण अर्जुन को अपना पता बताते हुए बहुत सटीक उदाहरण देते हैं:

“हे अर्जुन, मैं जल में रहने वाला स्वाद हूँ।”
“मैं सूर्य और चंद्रमा में रहने वाला *प्रकाश हूँ।”
“मैं आकाश में रहने वाला शब्द (ध्वनि) हूँ और मनुष्यों में रहने वाला सामर्थ्य हूँ।”

जिस तरह सोने के हार, चूड़ी या अंगूठी में मूल तत्व ‘सोना’ ही है, उसी तरह इस पूरी सृष्टि के अलग-अलग रूपों के पीछे छिपा हुआ एकमात्र सत्य ‘परमात्मा’ है।
जैसे धागे के बिना मोतियों की माला असंभव है, वैसे ही भगवान इस पूरे ब्रह्मांड को एक अदृश्य धागे की तरह जोड़कर रखते हैं।

गूगल मैप और भगवान के चार भक्त

आज के युग में हमें किसी अनजान रास्ते पर जाना हो तो हम गूगल मैप (Google Maps) का सहारा लेते हैं। कृष्ण कहते हैं कि मेरे पास आने वाले मुसाफिर

(भक्त) चार प्रकार के होते हैं: भक्त का प्रकार | लक्षण और मानसिकता |

૧. आर्त (The Distressed)* जब जीवन में कोई बड़ी मुसीबत या संकट आए तभी भगवान याद आएं (जैसे एग्जाम के समय या अस्पताल के बिस्तर पर)। |
૨. अर्थार्थी (The Seeker of Wealth)* भगवान के पास हमेशा डील (Deal) करने जाएं। “भगवान, मेरा प्रमोशन करवा दो, मैं ग्यारह नारियल चढ़ाऊँगा।” |
૩. जिज्ञासु (The Searcher) जिन्हें सत्य जानना है। जो सवाल पूछते हैं कि ‘मैं कौन हूँ? यह सृष्टि क्या है?’ |
૪. ज्ञानी (The Wise) जो समझ गए हैं कि भगवान के सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं। वे कुछ मांगते नहीं, सिर्फ प्रेम करते हैं। |

कृष्ण कहते हैं कि मुझे ये चारों भक्त पसंद हैं, क्योंकि वे कहीं और भटकने के बजाय मेरे पास तो आए! लेकिन इनमें ‘ज्ञानी’ मुझे सबसे प्रिय है, क्योंकि उसका गूगल मैप सीधा मेरे साथ ही कनेक्टेड है, उसे बीच में किसी स्वार्थ का स्टॉपेज नहीं नड़ता।

माया का रिमोट कंट्रोल

यह संसार एक बहुत बड़ी थ्री-डी (3D) गेम जैसा है, जिसे गीता में ‘माया’ कहा गया है। इस माया के तीन गुण हैं सत्व, रजस और तमस। इन तीन गुणों के प्रभाव में आकर हम लगातार सुख-दुःख, राग-द्वेष के चक्र में फंसे रहते हैं।

जैसे कोई वेब सीरीज़ देखते समय हम इतने खो जाते हैं कि कैरेक्टर रोए तो हम भी रो पड़ते हैं, जबकि हकीकत में वह सिर्फ एक स्क्रीन है। बस, यही माया है! कृष्ण कहते हैं कि इस माया को पार करना बहुत कठिन है, लेकिन जो व्यक्ति अपना रिमोट कंट्रोल मुझे सौंप देता है (यानी शरणागति स्वीकार करता है), वह इस माया के भ्रम से मुक्त हो जाता है।

आज के युग के लिए लाइफ लेसन

अध्याय ७ हमें सिखाता है कि विज्ञान भले ही पदार्थ का अंत कर दे, लेकिन आध्यात्मिकता जीवन की शुरुआत करती है। रोज़मर्रा के व्यस्त शेड्यूल से कुछ मिनट निकालकर जब हम प्रकृति को निहारते हैं, किसी की सेवा में अपना सामर्थ्य लगाते हैं, तब हम कृष्ण के उसी ‘ज्ञानविज्ञान’ को जी रहे होते हैं।
जंगल में जाकर ईश्वर को ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है, आप जो काम कर रहे हैं यदि उसे पूरी ईमानदारी, कुशलता और सच्चाई से करते हैं, तो आप ईश्वर के सही पते पर ही खड़े हैं!

(क्रमशः: आगामी अध्याय ८ में हम समझेंगे ‘अक्षरब्रह्म योग’ – समय की गणना कैसे होती है? और जीवन की अंतिम ओवर में सिक्सर कैसे मारें?)

दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर

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