पॉलिटिकल एनालिसिस, श्योर गुजरात : क्या देश में कानून और संविधान सबसे ऊपर है या किसी संगठन की ताकत? यह सवाल एक बार फिर कर्नाटक की राजनीति से उठा है और पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से लीगल रजिस्ट्रेशन की मांग की थी, जिसे कोई भी नागरिक या जनप्रतिनिधि लोकतांत्रिक तरीके से कर सकता है। लेकिन BJP MP रमेश जिगजिनानी ने इस न्यायिक मांग के खिलाफ जिस तरह की भाषा और मानसिकता दिखाई है, उसने देश के बुद्धिजीवियों और आम जनता को चौंका दिया है।
‘दलित होने’ पर सवाल और अंधेरी दुनिया जैसी धमकी!
BJP MP रमेश जिगजिनानी ने विवाद की सारी हदें पार करते हुए बयान दिया, “एक दलित व्यक्ति को RSS के मुद्दे में पड़ने की क्या ज़रूरत है!” यह बयान किसी खास जाति या वर्ग के अधिकारों पर खुलेआम हमला करने जैसा है। क्या संविधान में दिए गए बराबरी के अधिकार किसी खास जाति के व्यक्ति को सवाल पूछने से रोकते हैं?
इतना ही नहीं, MP ने तो आगे बढ़कर काले डॉन या डंडे जैसी भाषा का इस्तेमाल किया और धमकी भरे लहजे में कहा, “जिसने भी RSS के खिलाफ स्टैंड लिया है, वह बच नहीं पाया है।” एक डेमोक्रेटिक देश में, एक चुने हुए MP के मुंह से ऐसी धमकी भरी भाषा आना बहुत चिंताजनक और घटिया सोच का प्रतीक है।
क्या यह संविधान का खुला अपमान नहीं है?
बाबासाहेब अंबेडकर के दिए भारत के संविधान में देश का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग का हो, कानून की नज़र में बराबर है। जब प्रियांक खड़गे ने सिर्फ़ रजिस्ट्रेशन की कानूनी मांग की, तो उनकी जाति को बीच में लाकर उन्हें डराने की कोशिश करना भारतीय संविधान का सीधा अपमान है।
कोई भी संगठन देश के कानून और संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। ‘पक्को गुजरात’ यह सवाल उठाता है कि लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर इस तरह के खुलेआम धमकी भरे बयान और संविधान विरोधी सोच को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? क्या कानून और व्यवस्था ऐसे बयान देने वालों को अनदेखा कर देगी या संविधान सत्ता के बल पर चलता रहेगा? इस देश के लोग मजबूत हैं और सब कुछ देख रहे हैं।

