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अमन चोपड़ा पर कार्रवाई और लोकतंत्र पर सवाल! क्या सत्ता से सवाल पूछना अब गुनाह है?

नई दिल्ली/रांची (विशेष प्रतिनिधि): नाश्ता करते समय पत्रकार अमन चोपड़ा को झारखंड पुलिस का अपने साथ ले जाना—यह मामला सिर्फ एक पत्रकार तक सीमित नहीं है। यह सीधे तौर पर लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ पर चोट है, जिसका काम सत्ता से सवाल पूछना और जनता का सच सामने लाना है।
आज देश के सामने सबसे बड़ा अणियारा सवाल यह खड़ा हो गया है कि: क्या छात्रों के आंदोलन को कवर करना और उनकी आवाज को देश के सामने रखना अब अपराध माना जाएगा?

दोहरे रवैये पर सलगते सवाल: जंतर-मंतर बनाम झारखंड

लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं और स्वघोषित ‘ठेकेदारों’ की नीति और नीयत पर आज सवाल उठ रहे हैं:

दोहरा मापदंड क्यों?: जंतर-मंतर पर छात्रों के नाम पर हुई अभद्रता और अशोभनीय व्यवहार को दिखाना अगर पत्रकारिता का हिस्सा है, तो फिर झारखंड के शांतिपूर्ण छात्रों की न्यायसंगत आवाज़ को देश के सामने रखना गलत कैसे हो गया?

सिद्धांतों की बलि: जो लोग हर छोटे-बड़े मुद्दे पर यह चिल्लाते हैं कि “तानाशाह तो मोदी हैं…”, आज वे किसी राज्य सरकार की इस तरह की दमनकारी कार्रवाई पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? क्या लोकतंत्र की कसौटी सत्ता के चेहरे से तय होगी या सिद्धांतों से?

असहमति और आंदोलन: लोकतंत्र का असली अधिकार

लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है। शांतिपूर्ण आंदोलन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और उस सच को निडरता से सामने लाना एक निष्पक्ष पत्रकार का पहला कर्तव्य है।

सत्ता चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो—पत्रकार को तीखे सवाल पूछने की आज़ादी और आम नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार हर हाल में सुरक्षित रहना ही चाहिए।

आज अमन चोपड़ा, कल किसकी बारी?

यह घटनाक्रम हर उस नागरिक और पत्रकार के लिए एक चेतावनी है जो निष्पक्षता के साथ खड़े रहने की हिम्मत रखते हैं:

  1. प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला: अगर रिपोर्टिंग करने के आधार पर पत्रकारों को निशाना बनाया जाएगा, तो कोई भी मीडिया संस्थान निर्भीक होकर काम कैसे कर पाएगा?
  2. जनता की आवाज़ दबाने की कोशिश: आज अगर अमन चोपड़ा के साथ यह हुआ है, तो कल किसी और पत्रकार की बारी हो सकती है। आज अगर छात्रों की आवाज़ दबाई जा रही है, तो कल आम जनता का अवाज़ भी दबाया जा सकता है।

सत्ता के अहंकार में यह भूलना नहीं चाहिए कि लोकशाही में जनता और प्रेस की स्वतंत्रता सबसे ऊपर है। किसी की भी सरकार हो, पत्रकारिता की आज़ादी और जनता के अधिकारों का दमन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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