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किसान की बिजली काटी वन विभाग ने, पर झेलना पड़ा विद्युत कंपनी को; उपभोक्ता आयोग ने नहीं सुनी कोई दलील

मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक किसान को बिजली आपूर्ति बहाल न करने पर विद्युत वितरण कंपनी को ₹20,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि रुकावट की जानकारी होने के बाद कनेक्शन चालू करना पूरी तरह बिजली कंपनी की जिम्मेदारी है।

किसान की बिजली काटी वन विभाग ने, पर झेलना पड़ा विद्युत कंपनी को

भोपाल: मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बिजली आपूर्ति में रुकावट के एक मामले में विद्युत वितरण कंपनी के ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। आयोग ने एक किसान के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बिजली कंपनी को ₹20,000 का मुआवजा और अदालती खर्च देने का निर्देश दिया है। जस्टिस सुनीता यादव (अध्यक्ष) और मोनिका मलिक (सदस्य) की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि उपभोक्ता के परिसर में बिजली आपूर्ति को बहाल करना पूरी तरह से यूटिलिटी कंपनी की ही जिम्मेदारी है।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब पीड़ित किसान ने अपनी कृषि भूमि पर बिजली कनेक्शन और DP लगाने के लिए ‘नई पंप कनेक्शन सब्सिडी योजना’ के तहत आवेदन किया था। बिजली कंपनी के निर्देशों का पालन करते हुए किसान ने ₹2.04 लाख की राशि भी जमा कर दी थी। किसान का आरोप था कि कंपनी ने उसके खेत में बिजली के खंभे तो खड़े कर दिए, लेकिन न तो बिजली चालू की और न ही डीपी लगाई। इस लापरवाही के कारण किसान को खेती के काम में भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसके बाद उसने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

वन विभाग का पेंच और कंपनी के खोखले दावे

MP मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड ने जिला आयोग के 2016 के आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी थी कि उन्होंने खंभे गाड़कर और तार जोड़कर अपना काम पूरी तरह से किया था। बाद में जांच में पता चला कि वन विभाग ने इस बिजली आपूर्ति को बाधित कर दिया था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि बिजली कंपनी ने जनवरी 2015 में ही इस संबंध में वन विभाग को पत्र लिखा था, जिससे साबित होता है कि कंपनी इस व्यवधान से पूरी तरह वाकिफ थी। इसके बावजूद उन्होंने अदालत के सामने यह दावा किया कि उन्हें इस बात की जानकारी जिला आयोग का नोटिस मिलने के बाद हुई, जो उनकी अज्ञानता और लापरवाही को दर्शाता है।

जिला आयोग का फैसला बरकरार

राज्य उपभोक्ता आयोग ने जिला मंच के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें बिजली कंपनी को 15 दिनों के भीतर बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने और अन्य सरकारी विभागों से समन्वय कर बाधाओं को दूर करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, राज्य निकाय ने जिला आयोग के उस पिछले आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बिजली कंपनी को किसान द्वारा जमा किए गए ₹2.04 लाख के कनेक्शन शुल्क को वापस करने के लिए कहा गया था, क्योंकि अब कंपनी को कनेक्शन सुचारू रूप से चालू करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।

उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

सेवा में कमी: यदि उपभोक्ता किसी सेवा के लिए पूरा भुगतान कर देता है, तो निर्धारित समय सीमा के भीतर सेवा प्रदान करना कंपनी की कानूनी जिम्मेदारी है।
अंतर-विभागीय समन्वय: यदि बिजली लाइन बिछाने में वन विभाग या कोई अन्य सरकारी विभाग बाधा डालता है, तो उपभोक्ता को परेशान करने के बजाय बिजली कंपनी को उच्च अधिकारियों के माध्यम से उसका समाधान निकालना होगा।

जानकारी छुपाना भारी पड़ा: कंपनी द्वारा कोर्ट में यह कहना कि उन्हें व्यवधान की जानकारी नहीं थी, तब गलत साबित हुआ जब उनके द्वारा ही वन विभाग को लिखा गया पुराना पत्र सामने आ गया।

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