गांधीनगर, लीगल डेस्क | महानगर मेट्रो : साल 2013 के बहुचर्चित बलात्कार मामले में स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु आसाराम को लेकर हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आसाराम की उम्रकैद की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसे उनके लिए एक बहुत बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है। हालांकि, इसी मामले में हाईकोर्ट ने बड़ी राहत देते हुए दो अन्य सह-आरोपियों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देकर बरी करने का आदेश जारी किया है।
क्या था पूरा मामला?
साल 2013 में सूरत की रहने वाली एक पीड़िता ने आसाराम के खिलाफ अहमदाबाद के मोटेरा आश्रम में गंभीर शारीरिक शोषण और बार-बार बलात्कार किए जाने की शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने सभी सबूतों और गवाहों को सही मानते हुए आसाराम को दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सख्त सजा सुनाई थी। इसी सजा को चुनौती देते हुए आसाराम ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट का सख्त रुख, सह-आरोपियों को मिली रिहाई
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की लंबी दलीलों और कानूनी बारीकियों को सुनने के बाद अपना अंतिम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि आसाराम के खिलाफ अपराध की गंभीरता को देखते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई सजा बिल्कुल सही है और इसमें किसी भी तरह के बदलाव की गुंजाइश नहीं है।
दूसरी ओर, इस अपराध में मदद करने (साजिश रचने) के आरोप में सजा काट रहे अन्य दो सह-आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण हाईकोर्ट ने उन्हें तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया है।
मामले के मुख्य बिंदु
अदालत का फैसला: आसाराम की आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा कोर्ट में बरकरार।
राहत: मामले के दो सह-आरोपी सबूतों के अभाव में पूरी तरह बरी।
मामला: 2013 में सूरत की पीड़िता द्वारा अहमदाबाद के मोटेरा आश्रम को लेकर दर्ज कराया गया था केस।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने देश के नागरिकों के बीच न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत किया है। यह साफ संदेश है कि कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी रसूखदार, प्रभावशाली या बड़ा ‘बाबा’ क्यों न हो, देश का कानून और न्याय तंत्र सबके लिए बराबर है। पीड़िता को एक लंबी और मानसिक रूप से थका देने वाली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार पूर्ण न्याय मिला है।

