विशेष संपादकीय : महानगर मेट्रो ब्यूरो : हाल ही में ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) द्वारा जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026’ की रिपोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। जिस देश को हम ‘दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र’ कहते हैं, वहां प्रेस की आजादी के आंकड़े अब डराने लगे हैं। 180 देशों की सूची में भारत का 157वें स्थान पर खिसक जाना सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि हमारी अभिव्यक्ति की आजादी के वेंटिलेटर पर होने का सबूत है।
तीन साल का उतार-चढ़ाव: सुधार की उम्मीद पर फिरा पानी
पिछले तीन वर्षों का ट्रेंड देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है कि हम सुधार की दिशा में कितने कमजोर साबित हुए हैं:
2024: 159वीं रैंक
2025: 151वीं रैंक (एक हल्की उम्मीद जगी थी)
2026: 157वीं रैंक (फिर से वही ढलान)
पड़ोसियों से पिछड़ता ‘विश्वगुरु’
सबसे ज्यादा हैरान और परेशान करने वाली बात यह है कि जिन पड़ोसी देशों की लोकतांत्रिक स्थिरता पर हम अक्सर सवाल उठाते हैं, वे भी प्रेस की आजादी के मामले में हमसे बेहतर स्थिति में नजर आ रहे हैं।
नेपाल (87): हमसे कोसों आगे।
श्रीलंका (134): गंभीर संकटों के बावजूद बेहतर।
बांग्लादेश (152) और पाकिस्तान (153): ये देश भी भारत से ऊपर हैं।
जब हम प्रेस की आजादी में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों से भी नीचे गिर जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय पटल पर हमारी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के दावों की पोल खुल जाती है।
दर्पण जब धुंधला हो जाए…
प्रेस की आजादी केवल पत्रकारों की निजी समस्या नहीं है। यह उस ‘दर्पण’ की तरह है जिसमें लोकतंत्र अपना चेहरा देखता है। अगर पत्रकार सवाल पूछने से डरने लगे, अगर सच लिखने पर सलाखें या धमकियां मिलने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की बुनियाद खोखली हो रही है।
सवाल जो चुभेंगे:
1 क्या सत्ता के गलियारों में ‘सवाल’ अब ‘अपराध’ बन चुके हैं?
2 क्या मीडिया अब केवल ‘प्रचार’ का साधन बनकर रह गया है?
3 अगर हम अपने पड़ोसियों से भी पीछे हैं, तो क्या हम वाकई ‘विश्वगुरु’ बनने की राह पर हैं?
निष्कर्ष
लोकतंत्र तभी तक जिंदा है जब तक सवाल पूछने वाली आवाजें जिंदा हैं। यदि प्रेस की रैंक इसी तरह गिरती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब हम केवल एक ‘मौन लोकतंत्र’ बनकर रह जाएंगे। विचार कीजिए—क्या हम वाकई आजाद हैं या सिर्फ आजादी का ढोंग कर रहे हैं?

