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कोडीनार में लोकतंत्र का चीरहरण: क्या सत्ता के नशे में ‘खाकी’ बन गई है ‘गुलाम’?

3 करोड़ का ऑफर और 150 पुलिसकर्मियों का पहरा: कोडीनार में कांग्रेस पार्षदों को झुकाने के लिए दीनू बोघा का ‘पावर गेम’!

कोडीनार/अहमदाबाद : गुजरात के कोडीनार में चुनावी नतीजे आने के बाद से ही सियासी पारा सातवें आसमान पर है। पूरे जिले में जहाँ भाजपा का दबदबा रहा, वहीं कोडीनार तालुका पंचायत में कांग्रेस ने जीत हासिल कर भाजपा के विजय रथ को रोक दिया। लेकिन अब इस जनादेश को कुचलने के लिए जो खेल खेला जा रहा है, उसने प्रशासन और सत्ताधारी दल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

वफादारी की कीमत 3 करोड़?

विश्वस्त सूत्रों और स्थानीय नेताओं के अनुसार, कोडीनार तालुका पंचायत पर कब्जा करने के लिए भाजपा की ओर से ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति अपनाई जा रही है। आरोप है कि कांग्रेस के निर्वाचित सदस्यों को पाला बदलने के लिए 3 करोड़ रुपये तक के लालच दिए गए। जब कांग्रेस के इन वफादार सदस्यों ने धनबल के आगे झुकने से इनकार कर दिया, तो उनके खिलाफ दमनकारी नीति शुरू कर दी गई।

द्वारका में आधी रात का ‘ऑपरेशन पुलिस’

लोकतंत्र तब शर्मसार हो गया जब द्वारका में दर्शन करने गए कांग्रेस सदस्यों को निशाना बनाया गया। बताया जा रहा है कि लगभग 150 पुलिसकर्मियों की भारी फौज ने अचानक उन सदस्यों को घेर लिया और उन्हें जबरन वहां से उठा ले गई।

सवाल यह है: क्या किसी जनप्रतिनिधि का धार्मिक यात्रा पर जाना अपराध है?
सवाल यह भी: 150 पुलिसवालों की फौज भेजने का आदेश किस ‘ऊपर’ के अधिकारी ने दिया?

दीनू बोघा सोलंकी: रसूख के दम पर नियम ताक पर!

इस पूरी साजिश के पीछे भाजपा के कद्दावर नेता दीनू बोघा सोलंकी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी माने जाने वाले दीनू बोघा पर आरोप है कि कोडीनार में अपनी साख बचाने के लिए वे पुलिस और प्रशासन का दुरुपयोग कर रहे हैं। चर्चा है कि उन्हें ‘ऊपर’ से खुली छूट मिली हुई है, जिसके कारण वे जनादेश को ठेंगा दिखा रहे हैं।

जनता की अदालत में सुलगते प्रश्न

1 क्या लोकतंत्र में बहुमत का सम्मान सिर्फ कागजों तक सीमित है?
2 क्या पुलिस अब अपराधियों को पकड़ने के बजाय नेताओं के ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ का हिस्सा बन गई है?
3 क्या अमित शाह की दोस्ती का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संस्थाओं को कुचलने के लिए किया जा रहा है?

संपादकीय टिप्पणी:

कोडीनार की यह घटना गुजरात की राजनीति का एक काला अध्याय है। अगर पुलिस का इस्तेमाल इसी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों को डराने-धमकाने के लिए होता रहा, तो जनता का चुनाव प्रणाली से भरोसा उठना तय है। महानगर मेट्रो इस मामले की तह तक जाएगा।

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