गजब है ये सिस्टम : 2016 में पकड़ी गई थी शराब की महफिल, तो 2026 में सब ‘दूध के धुले’ कैसे निकले? क्या बीजेपी में आते ही धुल गए सारे पाप?
ब्यूरो रिपोर्ट: महानगर मेट्रो : अहमदाबाद: गुजरात में न्याय का तराजू किस ओर झुकता है, इसका एक ज्वलंत उदाहरण आज सबके सामने है। वर्ष 2016 का सैटेलाइट इलाके का वो बहुचर्चित शराब महफिल केस, जिसमें दिग्गज नेता अर्जुन मोढवाडिया के पुत्र पार्थ मोढवाडिया सहित कई रईसजादे पुलिस के शिकंजे में आए थे, उसमें अब कोर्ट का फैसला आ गया है। कोर्ट ने पार्थ मोढवाडिया को निर्दोष घोषित कर दिया है। इस फैसले के बाद जनता के बीच सिर्फ एक ही चर्चा है— “सब गोलमाल है भाई, सब गोलमाल है!”
पुलिस का गजब खेल: आखिर शराब किसकी थी?
याद कीजिए साल 2016 की वो रात, जब सैटेलाइट के एक पॉश फ्लैट में पुलिस ने छापेमारी की थी। तब पुलिस ने छाती ठोककर दावा किया था कि यहाँ शराब की महफिल जमी थी और भारी मात्रा में शराब बरामद की गई थी। अब सवाल यह उठता है कि यदि आज आरोपी निर्दोष हैं, तो क्या पुलिस वह शराब अपने घर से लाई थी? या फिर वह शराब हवा में गायब हो गई? अगर वहां महफिल नहीं जमी थी, तो क्या वे सब वहां ‘भजन-कीर्तन’ करने के लिए इकट्ठा हुए थे?
केसरिया रंग चढ़ते ही क्या फाइलें बदल गईं?
गलियारों में चर्चा गर्म है कि जब यह केस दर्ज हुआ था, तब अर्जुन मोढवाडिया कांग्रेस के कद्दावर नेता थे और सरकार पर तीखे हमले करते थे। लेकिन आज मंजर बदल चुका है; मोढवाडिया अब भाजपा के ‘माननीय’ मंत्री हैं। क्या यह महज एक संयोग है कि जैसे ही कंधे पर केसरिया दुपट्टा आया, सालों पुराने दाग धुल गए? सत्ता बदलने के साथ ही जांच की दिशा और गवाहों की याददाश्त भी बदल जाती है, यह अब जगजाहिर हो चुका है।
PSI पर 4 लाख की उगाही का आरोप और पूरा स्वांग
इस केस में एक नया मोड़ यह दिया गया कि तत्कालीन पीएसआई (PSI) ने 4 लाख रुपये की उगाही (तोड़) करने के लिए यह झूठा केस बनाया था। अब अगर पुलिस ही वसूली के लिए केस रचती है, तो जनता किस पर भरोसा करे? और यदि केस झूठा था, तो इसे इतने सालों तक क्यों खींचा गया? इस पूरे खेल के पीछे ‘ऊपर’ बैठे आकाओं के इशारों की बू आ रही है।
महानगर मेट्रो के कड़े सवाल:
अगर आरोपी निर्दोष हैं, तो जिन पुलिस अधिकारियों ने शराब पकड़ने का दावा किया था, उन पर क्या कार्रवाई होगी?
क्या गुजरात में कानून सिर्फ आम जनता के लिए है? नेताओं के बेटों के सामने पुलिस और सबूत इतने लाचार क्यों हो जाते हैं?
क्या भाजपा में शामिल होना ‘वॉशिंग मशीन’ की तरह आपराधिक इतिहास को मिटाने की गारंटी है?
अंतिम प्रहार: “न्याय की मूर्ति की आंखों पर पट्टी है, यह तो पता था, लेकिन यहाँ तो जांच करने वालों की नीयत पर भी पट्टी बंधी हुई लगती है। जनता सब देख रही है और सही समय पर इस ‘गोलमाल’ का जवाब भी देगी।”
संपादकीय : सत्ता की चापलूसी में जब न्याय का गला घोंटा जाता है, तब लोकतंत्र खतरे में पड़ता है। ‘महानगर मेट्रो’ सत्य लिखता रहेगा और सत्ता के दम पर गुनाह छुपाने वालों को बेनकाब करता रहेगा।

