महानगर मेट्रो ब्यूरो, सूरत : सूरत की राजनीति में कभी ‘बदलाव की लहर’ बनकर आई आम आदमी पार्टी (AAP) आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। हालिया घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया है कि सूरत में न तो ‘आप’ का जादू चला और न ही गोपाल इटालिया का चेहरा काम आया। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पार्टी की चमक अब पूरी तरह फीकी पड़ चुकी है।
2021 की जीत: पार्टी का दम नहीं, ‘पास’ (PAAS) का सहारा था
अतीत का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि 2021 के निकाय चुनावों में जो 27 सीटें AAP को मिली थीं, वह पार्टी की लोकप्रियता के कारण नहीं, बल्कि PAAS (पाटीदार अनामत आंदोलन समिति) के समर्थन की वजह से थीं। पाटीदार समाज की नाराजगी का फायदा उठाकर AAP ने जीत तो दर्ज की, लेकिन उसे संभाल नहीं पाई।
भ्रष्टाचार, सेटिंगबाजी और पद का दुरुपयोग : ‘शिक्षित और ईमानदार’ राजनीति का दावा करने वाली पार्टी की असलियत तब सामने आई जब उसके चुने हुए नुमाइंदों पर गंभीर आरोप लगे:
बिकाऊ पार्षद: पार्टी के अधिकांश कॉर्पोरेटर (पार्षद) अपनी निष्ठा बेचकर अन्य दलों के साथ सेटिंग करने और ‘तोड़बाजी’ में व्यस्त हो गए।
अक्षम नेतृत्व: शिक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली पार्टी ने विपक्ष के नेता जैसे महत्वपूर्ण पद पर ऐसे लोगों को बिठाया, जो कभी कॉलेज की दहलीज तक नहीं चढ़े थे।
जनता से दूरी: लोगों के काम करने के बजाय उगाही करना, दादागिरी और ‘लुख्खागिरी’ के चलते पार्टी जनता के बीच बुरी तरह बदनाम हो गई।
विचारधारा बनाम अवसरवाद
सौराष्ट्र में भी जो सीटें AAP के खाते में आई हैं, वे पार्टी के आधार पर नहीं बल्कि अन्य दलों के बागी नेताओं के जोर पर मिली हैं। चर्चा तेज है कि ये नेता भी जल्द ही भाजपा का दामन थाम लेंगे, क्योंकि बिना किसी ठोस विचारधारा और सक्षम नेतृत्व के राजनीतिक दुकान ज्यादा लंबी नहीं चल सकती।
“कांग्रेस 35 साल से सत्ता से बाहर है, फिर भी उसका अस्तित्व कायम है क्योंकि उसके पास एक विचारधारा है। लेकिन AAP जैसी पार्टियां ‘भादरवा के भिंडे’ (सीजनल फसल) की तरह हैं, जो थोड़े समय के लिए आती हैं और फिर गायब हो जाती हैं।”
क्या आपको लगता है कि AAP ने जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात किया है? क्या बिना किसी विजन के कोई राजनीतिक दल टिक सकता है?

