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IPS एसोसिएशन की ‘गरिमा’ पर सवाल: जब अपनों का दमन हुआ, तब आत्मा कहाँ सोई थी?

गांधीनगर : विशेष संवाददाता : विसावदर के विधायक गोपाल इटालिया द्वारा पुलिस अधिकारियों के लिए इस्तेमाल किए गए ‘दलाल’ शब्द ने गुजरात के प्रशासनिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। 27 अप्रैल 2026 को गुजरात IPS ऑफिसर्स एसोसिएशन ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इसे संस्था की गरिमा पर हमला बताया। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है—क्या पुलिस की छवि सिर्फ बयानों से खराब होती है या उनकी कार्यशैली भी इसके लिए जिम्मेदार है?

विवाद की जड़ : मर्यादा बनाम आक्रोश

विधायक गोपाल इटालिया का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें उन्होंने पुलिस को ‘दलाल’ कहा। एसोसिएशन का तर्क है कि इससे पुलिस का मनोबल गिरता है। नियम और नैतिकता की दृष्टि से किसी भी जनप्रतिनिधि की भाषा शालीन होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या तंत्र खुद ‘मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट’ (MCC) का ईमानदारी से पालन कर रहा है?

सत्ता के सामने नतमस्तक, विपक्ष पर सख्त? : पूर्व IPS अधिकारी रमेश सवानी के लेख ने एसोसिएशन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं:

चुनिंदा कार्रवाई: जब सत्ताधारी दल के नेता पुलिसकर्मियों के साथ सरेआम दुर्व्यवहार करते हैं, तब IPS एसोसिएशन लिखित शिकायत लेकर चुनाव आयोग क्यों नहीं जाता?
लोकतंत्र और निर्विरोध चुनाव: प्रदेश में सैकड़ों उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना क्या वास्तव में स्वेच्छा है या इसके पीछे पुलिस का ‘दबाव’ है? अगर पुलिस निष्पक्ष नहीं है, तो जनता की नजर में उसकी छवि ‘रक्षक’ की कैसे बनी रहेगी?

वो ‘मौन’ जो आज भी गूँजता है

सबसे बड़ा प्रहार उन अधिकारियों के नाम पर है जिन्होंने संविधान की रक्षा के लिए अपनी आहुति दे दी। जब सतीश वर्मा, रजनीश राय और राहुल शर्मा जैसे काबिल अधिकारियों को सत्ता के आदेश न मानने की सजा दी गई, तब इस एसोसिएशन की ‘आत्मा’ कहाँ थी? क्या उस वक्त संस्था की गरिमा पर आंच नहीं आई थी? अपने ही साथियों के दमन पर चुप्पी साधने वाला संगठन आज एक शब्द पर इतना आक्रामक क्यों है?

महानगर मेट्रो का नजरिया

सम्मान मांगा नहीं जाता, अपनी कार्यशैली से कमाया जाता है। ‘दलाल’ शब्द भले ही अभद्र हो, लेकिन यह उस गुस्से का प्रतीक है जो जनता के बीच प्रशासन की तरफदारी को लेकर पनप रहा है। यदि पुलिस और प्रशासन सत्ता के ‘एजेंट’ के रूप में काम करेंगे, तो शब्दों की मर्यादाएँ टूटेंगी ही।क्या IPS एसोसिएशन वास्तव में वर्दी का सम्मान बचाना चाहता है या वह केवल सत्ता की गुड-बुक में बने रहने के लिए विपक्ष को निशाना बना रहा है? खाकी पर लगे दाग शिकायतों से नहीं, बल्कि ‘निष्पक्षता’ से धुलेंगे।

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