स्थानीय निकाय चुनाव से ठीक पहले नियम बदला: अब अपराधी भी संभालेंगे पोलिंग बूथ और मतगणना की जिम्मेदारी।
अहमदाबाद : गुजरात में स्थानीय निकाय (स्थानीय स्वराज्य) चुनावों की सरगर्मियां अपने चरम पर हैं। मतदान में अब महज कुछ ही घंटों का समय शेष है, लेकिन इसी बीच राज्य चुनाव आयोग के एक आदेश ने पूरे प्रदेश में विवादों का बवंडर खड़ा कर दिया है। आयोग ने एक चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए उस नियम को रद्द कर दिया है, जो अपराधियों को चुनावी एजेंट बनने से रोकता था।
क्या है पूरा विवाद?
अब तक के चुनावी नियमों के अनुसार, कोई भी राजनीतिक दल किसी ऐसे व्यक्ति को अपना इलेक्शन एजेंट, पोलिंग एजेंट या काउंटिंग एजेंट नहीं बना सकता था, जिसका आपराधिक रिकॉर्ड हो। चुनाव आयोग की इस महत्वपूर्ण धारा का उद्देश्य मतदान और मतगणना के दौरान पारदर्शिता और शांति बनाए रखना था।
लेकिन, अंतिम समय में आयोग ने इस अनिवार्य प्रावधान को हटा दिया है। अब राजनीतिक दलों को खुली छूट मिल गई है कि वे किसी भी ‘गुनेगार’ व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनाकर बूथ के भीतर बिठा सकते हैं।
लोकतंत्र के लिए ‘कलंक’ क्यों?
राजनीतिक विश्लेषकों और नागरिक समाज ने इस फैसले को “लोकतंत्र पर प्रहार” करार दिया है। इसके पीछे निम्नलिखित गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं:
मतदाताओं में भय: पोलिंग बूथ के अंदर आपराधिक छवि वाले लोगों की मौजूदगी से आम मतदाता डरा हुआ महसूस कर सकता है, जिससे निष्पक्ष मतदान प्रभावित होगा।
अधिकारियों पर दबाव: बूथ पर तैनात सरकारी कर्मचारी और चुनाव अधिकारी बाहुबलियों के दबाव में काम करने को मजबूर हो सकते हैं।
हिंसा की आशंका: मतगणना केंद्रों पर धौंस जमाने के लिए अपराधी तत्वों का उपयोग होने की संभावना बढ़ गई है।
जनता पूछ रही है सवाल?
विपक्ष और जागरूक नागरिकों का कहना है कि जहां एक ओर राजनीति को अपराध मुक्त करने की बातें की जा रही हैं, वहीं चुनाव आयोग का यह कदम अपराधियों को ‘रेड कार्पेट’ देने जैसा है। आखिर किसके दबाव में और क्यों चुनाव से ऐन पहले इस पवित्र नियम को बलि चढ़ाया गया?
बॉक्स आइटम: खास बातें
आयोग का यू-टर्न: कल तक जो अपराधी बूथ से बाहर थे, आज वे आधिकारिक ‘एजेंट’ बनकर अंदर बैठेंगे।
संवैधानिक मर्यादा: क्या चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता खो रहा है?
सियासी पारा हाई: सभी प्रमुख दलों के बीच अब ‘बाहुबलियों’ को ढाल बनाने की होड़ मचने की आशंका।

