नाराजगी, विरोध और सत्ता विरोधी लहर ने बढ़ाई धड़कनें; जानें किन क्षेत्रों में है भाजपा की राह मुश्किल।
अहमदाबाद : स्थानीय निकाय चुनावों के शंखनाद के साथ ही अहमदाबाद की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। जहाँ एक ओर भाजपा ‘क्लीन स्वीप’ का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर शहर के कई प्रमुख इलाकों से आ रही ‘विरोध की लहर’ ने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार अहमदाबाद के कुछ किलों में भाजपा की सीटें 100% कट सकती हैं।
किन इलाकों में है ‘खतरे की घंटी’?
ग्राउंड जीरो से मिल रही जानकारी के अनुसार, शहर के पूर्वी और पश्चिमी दोनों हिस्सों के कुछ वार्डों में स्थानीय उम्मीदवारों और विकास कार्यों को लेकर भारी नाराजगी है:
पूर्वी अहमदाबाद (बापू नगर, निकोल, नरोडा): यहाँ मध्यम वर्गीय परिवारों में महंगाई और स्थानीय बुनियादी सुविधाओं (सड़क, पानी, गटर) को लेकर आक्रोश है। कई जगहों पर भाजपा के कार्यकर्ताओं को ही स्थानीय लोगों के कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
नया पश्चिम क्षेत्र (गोता, घाटलोदिया, चांदलोदिया): भले ही यह भाजपा का गढ़ माना जाता है, लेकिन ‘अति-आत्मविश्वास’ और स्थानीय पार्षदों की निष्क्रियता के कारण यहाँ का युवा वर्ग और सोसायटी के लोग बदलाव के मूड में दिख रहे हैं।
मध्य और दक्षिण क्षेत्र (मणिनगर, दानीलीमडा के आस-पास): यहाँ कुछ सीटों पर जातिगत समीकरण और टिकट वितरण को लेकर आंतरिक कलह चरम पर है, जिसका सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है।
क्या रणनीति बदलेगी भाजपा?
सूत्रों की मानें तो विरोध को देखते हुए भाजपा अब ‘डैमेज कंट्रोल’ मोड में आ गई है। बड़े नेताओं को रूठे हुए कार्यकर्ताओं को मनाने की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव के आखिरी घंटों में यह नाराजगी दूर हो पाएगी?
सियासी चर्चा
“इस बार गणित अलग है!”
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार मतदाता ‘मौन’ है। अगर अहमदाबाद की इन सीटों पर भाजपा का गणित बिगड़ा, तो इसका असर पूरे राज्य की राजनीति पर पड़ेगा।

