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घर के लड़के घंटी चाटें और बाहरी को थाली: टैक्स के बोझ तले दबी हिंदू जनता पूछ रही है—’हमारे योगदान का सिला क्या?’

सियासत का दोहरा खेल: एक तरफ नफरत की दीवार, दूसरी तरफ करोड़ों के ‘तुष्टिकरण’ वाले पैकेज?
टैक्सपेयर्स की अनदेखी: देश की 73% हिंदू आबादी टैक्स भरते-भरते बेहाल, फिर भी सुविधाओं के नाम पर सन्नाटा।
सावधान रहने का वक्त: बार-बार ठोकर खाकर भी न संभलने वालों को इतिहास कभी माफ नहीं करता।

ब्यूरो रिपोर्ट: विशेष विश्लेषण : अहमदाबाद/नई दिल्ली: राजनीति के गलियारों से एक ऐसी कहावत चरितार्थ हो रही है जो आज के दौर में बिल्कुल सटीक बैठती है—”घर के लड़के घंटी चाटें और उपाध्याय को आटा।” देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी, जो देश के राजस्व में 73% से अधिक का योगदान देती है, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या सत्ताधारी दल केवल वोटों के ध्रुवीकरण के लिए जनता को आपस में लड़ा रहा है, जबकि पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही है?

दोहरी राजनीति का शिकार होती जनता

जनता के बीच यह चर्चा आम है कि एक तरफ तो हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत की खाई गहरी की जा रही है, और दूसरी तरफ ‘वोट बैंक’ को साधने के लिए 3400 करोड़ रुपये जैसे भारी-भरकम पैकेज बांटे जा रहे हैं। जनता का आरोप है कि सरकार “चोर को कहे चोरी कर और पुलिस को कहे पकड़ो” वाली नीति पर चल रही है। आम नागरिक पूछ रहा है कि अगर समाज में केवल संघर्ष ही बचा है, तो विकास के वादे और करोड़ों के इन पैकेजों का असली लाभार्थी कौन है?

टैक्सपेयर्स की सूखी थाली

आंकड़े गवाह हैं कि देश का मध्यमवर्गीय हिंदू परिवार अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देता है। लेकिन बदले में उसे क्या मिल रहा है? महँगाई, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव। वहीं दूसरी ओर, तुष्टिकरण की राजनीति के तहत विशेष पैकेजों की घोषणाएं उन लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी हैं, जो दिन-रात देश की अर्थव्यवस्था को अपने पसीने से सींच रहे हैं।

अनुभव से सीखने की ज़रूरत: अब और कितनी ठोकरें?

कहा जाता है कि समझदार वह है जो दूसरों के अनुभव से सीखे, और सामान्य वह जो ठोकर खाकर सीखे। लेकिन उस इंसान को क्या कहेंगे जो बार-बार एक ही गड्ढे में गिरता है और फिर भी संभलने को तैयार नहीं?

अंधभक्ति का परिणाम: जनता को अब यह समझना होगा कि भावनाओं में बहकर लिए गए फैसले आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार में डाल सकते हैं।
सावधानी हटी, दुर्घटना घटी: अगर अब भी जनता जागरूक नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब “जम (यमराज) घर देख लेगा” वाली स्थिति पैदा हो जाएगी।

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