अलथाणा में छेड़खानी के खिलाफ उमड़ा जनसैलाब, लेकिन भाजपा प्रचारकों द्वारा महिला से धक्का-मुक्की पर सन्नाटा; क्या न्याय अब ‘चेहरा’ देखकर मिलेगा?
सूरत : कहते हैं कि संगठित समाज में अपार शक्ति होती है और न्याय छीनने की कुव्वत होती है। हाल ही में सूरत के अलथाणा इलाके में हुई एक घटना ने इस ताकत का अहसास कराया, जहाँ एक युवती के साथ विधर्मी युवक द्वारा की गई छेड़खानी के विरोध में पूरा हिंदू समाज और विभिन्न संगठन एकजुट हो गए। समाज की इस सक्रियता के चलते प्रशासन को तुरंत हरकत में आना पड़ा। लेकिन, इसी सूरत की एक दूसरी तस्वीर ने “सामाजिक मजबूती” की परिभाषा पर सवालिया निशान लगा दिया है।
दो घटनाएं, दो अलग व्यवहार
शहर में चर्चा का विषय यह है कि जहाँ ‘विधर्मी’ के मुद्दे पर समाज की एकजुटता देखते ही बनती है, वहीं अपनों के बीच हो रहे अन्याय पर चुप्पी क्यों साध ली जाती है?
घटना-1 (अलथाणा): यहाँ युवती के सम्मान के लिए हजारों लोग सड़कों पर उतरे और आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। यह एक जागृत समाज का प्रमाण था।
घटना-2 (प्रचार के दौरान): आरोप है कि इसी क्षेत्र में भाजपा के चुनाव प्रचार के दौरान कुछ समर्थकों/प्रचारकों ने एक महिला को सरेआम धक्का मारा और बदसलूकी की। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इस घटना के समय न तो कोई संगठन आगे आया और न ही समाज ने वैसी एकजुटता दिखाई।
न्याय की लड़ाई में ‘चयनात्मक’ न बनें
इस विरोधाभास ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या हमारा गुस्सा और हमारी एकजुटता केवल ‘सामने वाले’ के धर्म या पार्टी को देखकर तय होती है?
एक मजबूत समाज वही है जो हर उस महिला के साथ खड़ा हो जिसका अपमान हुआ है, चाहे अपमान करने वाला कोई विधर्मी हो या किसी शक्तिशाली सत्ताधारी दल का कार्यकर्ता।
समाज की मजबूती ही असली सुरक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस देश में न्याय केवल उसी को मिलता है जिसका समाज मजबूत और निष्पक्ष हो। अगर समाज केवल राजनीतिक हितों को देखकर प्रतिक्रिया देगा, तो वह अपनी असली ताकत खो देगा। यदि आज हम अपनों द्वारा की गई बदसलूकी पर चुप रहे, तो कल कोई भी सत्ता या संगठन आम नागरिक को कुचलने की हिम्मत करेगा।

