विशेष विश्लेषण: क्या भारत को भी अपनाना चाहिए शिक्षा का ‘नो-प्रॉफिट’ मॉडल?
बीजिंग/नई दिल्ली | महानगर संवाददाता : शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण की नींव होती है, लेकिन जब यह नींव व्यापार की भेंट चढ़ जाए, तो समाज का ढांचा डगमगाने लगता है। हाल ही में चीन सरकार ने एक ऐतिहासिक और बेहद सख्त फैसला लेते हुए बुनियादी शिक्षा (Basic Education) के क्षेत्र में निजी कंपनियों और कोचिंग संस्थानों के ‘मुनाफा कमाने’ पर पूरी तरह लगाम लगा दी है। चीन का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण भविष्य देना है। इस फैसले के बाद अब भारत में भी यह सवाल गूंजने लगा है— “क्या भारत में ऐसा निर्णय संभव नहीं है?”
चीन का मास्टरस्ट्रोक: क्यों लिया यह फैसला?
चीन सरकार ने महसूस किया कि निजी ट्यूशन और महंगे निजी स्कूलों के कारण अभिभावकों पर आर्थिक बोझ असहनीय होता जा रहा था। प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई थी कि बच्चों का बचपन किताबों के बोझ और तनाव के नीचे दब गया था। चीन ने अब स्पष्ट कर दिया है कि बुनियादी शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान ‘नॉन-प्रॉफिट’ (गैर-लाभકારી) आधार पर ही चलेंगे।
भारत में क्यों हो रही है इसकी चर्चा?
भारत में भी शिक्षा के व्यवसायीकरण को लेकर जनता के बीच भारी नाराजगी है। आम आदमी की चर्चाओं में ये बिंदु प्रमुखता से उठ रहे हैं:
महंगी फीस का बोझ: मिडिल क्लास परिवार की आय का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की स्कूल फीस और ट्यूशन में चला जाता है।
कोचिंग माफिया: बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक कोचिंग सेंटरों का जाल फैल गया है, जो शिक्षा को केवल एक ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेच रहे हैं।
समान शिक्षा का अभाव: पैसे वाले बच्चों को बेहतर संसाधन मिल रहे हैं, जबकि गरीब मेधावी छात्र पीछे छूट रहे हैं।
भारत के लिए क्या हैं चुनौतियां?
जानकारों का मानना है कि भारत में चीन जैसा मॉडल लागू करना इतना आसान नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं:
1 लोकतंत्र बनाम साम्यवाद: चीन में सरकार एक आदेश से पूरा ढांचा बदल सकती है, जबकि भारत में निजी संस्थानों के अपने अधिकार और कानूनी सुरक्षा है।
2 सरकारी ढांचे की कमी: यदि निजी संस्थानों पर लगाम कसी गई, तो क्या हमारे सरकारी स्कूल उस भारी दबाव को झेलने के लिए तैयार हैं?
3 निवेश का सवाल: भारत में शिक्षा क्षेत्र में भारी निजी निवेश है, जिस पर अचानक रोक लगाने से रोजगार और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

