अहमदाबाद/नई दिल्ली | महानगर ब्यूरो : केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी अक्सर देश को 100% इथेनॉल आधारित ईंधन का सपना दिखाते हैं। वे इसे ‘ग्रीन फ्यूल’ कहते हैं, लेकिन महानगर मेट्रो की विशेष पड़ताल में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे डराने वाले हैं। डेटा गवाह है कि यह चमकता हुआ सपना भारत के भूजल और भविष्य को सुखा सकता है।
एक लीटर ईंधन, हजारों लीटर पानी
सरकारी आंकड़ों और नीति आयोग (2020 रिपोर्ट) के अनुसार, गन्ने से बनने वाले मात्र 1 लीटर इथेनॉल के लिए औसतन 2,860 लीटर पानी की खपत होती है। ICAR का अध्ययन इसे 2,001 लीटर बताता है, तो खाद्य सचिव के अनुसार यह आंकड़ा 3,630 लीटर तक जाता है। यदि हम गडकरी जी के 70% से 100% ब्लेंडिंग के लक्ष्य को देखें, तो देश को करीब 3,500 करोड़ लीटर इथेनॉल की जरूरत होगी।
बजट से भी महंगा पड़ेगा पानी!
गणित सीधा और खौफनाक है। 3,500 करोड़ लीटर इथेनॉल तैयार करने के लिए 100 ट्रिलियन (100 लाख करोड़) लीटर पानी चाहिए होगा। आज शहरों में 10,000 लीटर पानी के टैंकर की कीमत औसतन 1,000 रुपये है। इस हिसाब से इथेनॉल के लिए लगने वाले पानी की कीमत 10,000 अरब रुपये बैठती है, जो भारत के कुल सालाना बजट से भी ज्यादा है। परिणाम साफ है—आने वाले समय में पेट्रोल से महंगा पीने का पानी (100 रुपये लीटर) बिकेगा।
सूखते कुएं और बढ़ता खतरा
महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों में 60% कुएं पहले ही सूखने की कगार पर हैं। नीति आयोग खुद स्वीकार करता है कि देश के अधिकांश जिले ‘वॉटर स्ट्रेस’ (पानी की भारी किल्लत) की श्रेणी में हैं। ऐसे में गडकरी जी का यह कहना कि ‘देश में पानी की कोई कमी नहीं है’, जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।
निष्कर्ष: दिमाग की कीमत या चुनावी स्टंट?
हाल ही में गडकरी जी ने कहा था कि उनके “दिमाग की कीमत 200 करोड़ रुपये है”। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह ‘दिमाग’ देश के गिरते भूजल स्तर और भविष्य के अकाल को देख पा रहा है? इथेनॉल को ग्रीन फ्यूल कहना सही है, लेकिन इसकी भारी जल-लागत को नजरअंदाज करना आत्मघाती है। बिना जल प्रबंधन के यह सिर्फ ‘हवाबाजी’ और राजनीति के ऊंचे सपने जैसा है।
हमारा नजरिया
क्या हम सस्ते ईंधन के चक्कर में अपनी आने वाली पीढ़ियों के मुंह से पानी छीन रहे हैं? सरकार को डेटा और भूगोल की हकीकत समझनी होगी, सिर्फ फैंसी घोषणाओं से पेट नहीं भरता।

