विशेष संपादकीय – महानगर मेट्रो : नई दिल्ली : “मैं इसीलिए चुनाव में खड़ा नहीं होता, क्योंकि मैदान में उतरते ही मेरे खिलाफ 10-12 झूठी अर्जियां दाखिल हो जाएंगी!”—यह महज एक व्यक्ति का डर नहीं, बल्कि आज के भारत के उस आम आदमी की हकीकत है जो देश बदलना तो चाहता है, लेकिन सिस्टम के ‘कीचड़’ से डरता है। आज की राजनीति सेवा का मार्ग नहीं, बल्कि विरोधियों को ‘निपटाने’ की साजिश बन गई है।
- चरित्र हनन: राजनीति का नया हथियार
आज के दौर में चुनाव नीतियों पर नहीं, बल्कि ‘नीचता’ पर लड़ा जा रहा है। जैसे ही कोई पढ़ा-लिखा या ईमानदार व्यक्ति चुनाव लड़ने का मन बनाता है, तंत्र और विरोधी सक्रिय हो जाते हैं। झूठी शिकायतें, पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ना और चरित्र हनन की ऐसी मशीनें चलाई जाती हैं कि एक शरीफ इंसान अपनी इज्जत बचाने के लिए मैदान छोड़ने पर मजबूर हो जाता है।
- 90 के दशक का डर, 2026 का ‘डिजिटल’ प्रहार
90 के दशक में बाहुबली डराकर घर बिठाते थे, आज ‘फेक एप्लीकेशन’ और कानूनी दांव-पेच के जरिए डराया जा रहा है। एक उम्मीदवार खुद को तब तक सुरक्षित नहीं मानता जब तक वह सत्ता की शरण में न चला जाए। अगर चुनाव लड़ने की शर्त अपनी आबरू दांव पर लगाना है, तो फिर लोकतंत्र में ‘लोक’ (जनता) कहां बचेगी?
- ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की बलि चढ़ती ईमानदारी
सत्ता हथियाने की अंधी दौड़ ने ‘शाम-दाम-दंड-भेद’ को अपना धर्म बना लिया है। निर्दोषों को फर्जी मुकदमों में फंसाना और उन पर दबाव बनाना अब चुनावी रणनीति का हिस्सा है। यही कारण है कि आज संसद और विधानसभाओं में बुद्धिजीवियों की जगह उन लोगों की संख्या बढ़ रही है जो ‘सिस्टम’ को मैनेज करना जानते हैं।
महानगर मेट्रो का सीधा सवाल:
अगर झूठी अर्जियों और कानूनी धमकियों के डर से अच्छे लोग राजनीति से दूर रहेंगे, तो फिर देश की बागडोर किन हाथों में जाएगी? क्या हमने लोकतंत्र को केवल बाहुबलियों और धनबलियों का अखाड़ा बना दिया है? याद रखिए, जब शरीफ आदमी चुप रहता है, तब सिस्टम और भी ज्यादा निरंकुश हो जाता है।

