Homeभारतगुजरातलोकतंत्र का उत्सव या चुनावी 'सेटिंग' का खेल?

लोकतंत्र का उत्सव या चुनावी ‘सेटिंग’ का खेल?

बदलता ट्रेंड : निर्विरोध जीत के बीच दम तोड़ता जनता का ‘राइट टू रिजेक्ट’!

अहमदाबाद | विशेष रिपोर्ट : गुजरात की राजनीति में इन दिनों एक नया ‘शॉर्टकट’ चर्चा में है—’निर्विरोध’ (Unopposed) चुने जाना। नामांकन वापस लिए जाते हैं, पर्चे खारिज होते हैं और अंत में मैदान में बचता है सिर्फ एक ‘महारथी’। ढोल-नगाड़े बजते हैं, जीत का तिलक लगता है, लेकिन इस शोर के बीच क्या आपने

लोकतंत्र की खामोश सिसकी सुनी?

महानगर मेट्रो आज जनता के उस बुनियादी सवाल को उठा रहा है, जो सत्ता के गलियारों में दबा दिया गया है: “जब EVM में NOTA (इनमें से कोई नहीं) का विकल्प मौजूद है, तो बिना मतदान के किसी को विजेता कैसे माना जा सकता है?”

जनता की अदालत: ये तीन सवाल पूछना जरूरी है!

लोकतंत्र में वोट देना सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य है। लेकिन जब उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिया जाता है, तो मतदाता से उसकी ‘नापसंदगी’ व्यक्त करने का हक छीन लिया जाता है।

  1. पसंद का विकल्प कहाँ?: अगर जनता को मैदान में बचा हुआ इकलौता उम्मीदवार पसंद ही न हो, तो वह अपनी नाराजगी कहाँ दर्ज कराए?
  2. जीत की योग्यता क्या है?: क्या महज प्रतिद्वंद्वी का न होना ही जीत की गारंटी है? क्या जनता का समर्थन हासिल करना अनिवार्य नहीं होना चाहिए?
  3. NOTA बनाम उम्मीदवार: क्या लोकतंत्र की गरिमा के लिए यह जरूरी नहीं कि उम्मीदवार को कम से कम NOTA से ज्यादा वोट लाकर अपनी

लोकप्रियता साबित करनी पड़े?

कानून की आड़ और NOTA की बेबसी

मौजूदा चुनावी गणित को समझें तो ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 53(2) चुनाव आयोग को यह शक्ति देती है कि यदि सीटों के बराबर ही उम्मीदवार बचे हों, तो उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाए।

कड़वा सच यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद वर्तमान में NOTA केवल एक ‘प्रतीकात्मक विरोध’ बनकर रह गया है। अगर किसी चुनाव में NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिल भी जाएं, तो भी दूसरे नंबर वाले (जीवित उम्मीदवार) को ही विजेता माना जाता है। यानी, NOTA आईना तो दिखा सकता है, लेकिन सत्ता की कुर्सी नहीं छीन सकता।

सुधार की मांग: अब चाहिए ‘राइट टू रिजेक्ट’ का ब्रह्मास्त्र

विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि यदि लोकतंत्र को ‘सेटिंग’ से बचाना है, तो ये तीन बदलाव क्रांतिकारी साबित होंगे:

  • अनिवार्य मतदान: भले ही एक उम्मीदवार हो, वोटिंग होनी चाहिए। ताकि पता चले कि कितने लोग उसके साथ हैं और कितने खिलाफ।
  • NOTA को मिले ताकत: अगर NOTA को उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिलें, तो चुनाव रद्द हो। नए चुनाव में पुराने उम्मीदवारों के लड़ने पर पाबंदी लगे।
  • मतदाता का सम्मान: वोटर को पोलिंग बूथ तक जाकर अपनी ‘ना’ दर्ज करने का संवैधानिक मौका मिलना ही चाहिए।

महानगर मेट्रो की बात: लोकतंत्र की हार या जीत?

जब सत्ता के सौदे और सियासी चालों के बीच प्रतिद्वंद्वी मैदान छोड़ देते हैं, तो जीत किसी नेता की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हार होती है। अगर जनता से ‘ना’ कहने का अधिकार छीन लिया जाएगा, तो ‘हां’ की कीमत भी शून्य हो जाएगी। चुनाव आयोग को अब सोचना होगा कि NOTA को सिर्फ एक बेजान बटन बनाए रखना है या उसे जनता का असली ब्रह्मास्त्र बनाना है!

आपका क्या सोचना है? क्या निर्विरोध चुने जाने की यह परंपरा हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है? अपनी राय हमें लिखें।

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