लेखक: पवन माकन (ग्रुप एडिटर, महानगर मेट्रो) : दुनिया में सबसे बड़ा अपराध क्या है? चोरी, डकैती या हत्या? शायद नहीं। आज के दौर में सबसे बड़ा अपराध है—’समय से पहले सच बोल देना’।
जब पूरी दुनिया एक प्रायोजित डर के साये में जी रही थी, जब ‘महामारी’ के नाम पर देशों को बंधक बनाया जा रहा था, तब हमने चीख-चीख कर आगाह किया था। लेकिन तब सच बोलने वालों के साथ क्या हुआ? उन्हें ‘कॉन्स्पिरेसी थ्योरिस्ट’ (अफवाह फैलाने वाला) कहा गया, उन्हें पाकिस्तान का एजेंट बताया गया और सोशल मीडिया की तानाशाही ने उनकी आवाज़ को दबाने के लिए प्रोफाइल तक सस्पेंड कर दिए।
प्रायोजित महामारी और गुलामी का नया मॉडल
इतिहास गवाह है कि जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आए थे, उसके तुरंत बाद देश में आतंक का माहौल तैयार किया गया। यह महज इत्तेफाक नहीं था। यह फार्मा माफियाओं और सत्ता के दलालों का एक ऐसा चक्रव्यूह था, जिसमें आम आदमी को ‘सुरक्षा कवच’ के नाम पर मजबूर किया गया।
सवाल यह है कि आखिर दुनिया के बड़े-बड़े प्रभावशाली लोग इस ‘सुरक्षा कवच’ को थोपने के लिए इतने बेताब क्यों थे?
एपस्टीन का जाल और सीडी का खेल
सच्चाई की परतें अब खुल रही हैं। क्या यह सब किसी बड़े ब्लैकमेलिंग रैकेट का हिस्सा था? जेफरी एपस्टीन जैसे किरदारों ने दुनिया के रसूखदारों को अपने जाल में फंसा रखा था। जब सत्ता की चाबी और रसूखदारों की ‘सीडी’ माफियाओं के हाथ में हो, तो वे वही करेंगे जो उनके आका चाहेंगे। चाहे इसके लिए
निर्दोषों की जान की बलि ही क्यों न देनी पड़े।
सेंसरशिप का प्रहार: फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने हजारों पोस्ट डिलीट कीं। क्यों? क्योंकि वे सच को ‘मिसलीडिंग’ बताकर माफियाओं का एजेंडा चला रहे थे।
ईमानदार विशेषज्ञों की अनदेखी: दुनिया भर के वो डॉक्टर और वैज्ञानिक जो प्रमाण दे रहे थे, उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया गया।
भरोसे का कत्ल: आज जब सच सामने आ रहा है, तो सवाल उन नेताओं, अभिनेताओं और धार्मिक गुरुओं पर भी उठता है जो इस प्रोपेगेंडा के ब्रांड एंबेसडर बने हुए थे।
मेरी बेबाक राय
मैं आज भी कहता हूं कि व्यवस्थाओं पर आंख मूंदकर विश्वास करना गुलामी की पहली सीढ़ी है। जो जानकारी विदेशों से आ रही थी, उसे भारत में सार्वजनिक करना ‘जघन्य अपराध’ बना दिया गया था ताकि माफिया अपना व्यापार कर सकें।
महानगर मेट्रो के पाठकों से मेरा सिर्फ इतना कहना है—जागते रहिए। जो सच आज सामने आ रहा है, हम उसके लिए वर्षों पहले अपनी डिजिटल पहचान दांव पर लगा चुके हैं। हम न तब झुके थे, न आज रुकेंगे।
अंतिम शब्द:
शेर की एक दिन की जिंदगी गीदड़ की सौ साल की गुलामी से बेहतर है। सच कड़वा हो सकता है, लेकिन वह अंततः सामने आता ही है।
सच के साथ, निर्भीक पत्रकारिता।

