व्यंग्य और विश्लेषण : राजनीति में एक पुरानी कहावत है— “वोट डलने तक सरकार जनता की होती है, और वोट डलते ही जनता सरकार की।” बंगाल चुनाव के खत्म होते ही अब कुछ ऐसे ही हालात नजर आ रहे हैं। जो लोग पिछले कुछ दिनों से इस बात पर चुटकी ले रहे थे कि “मोदी सरकार तेल के दाम क्यों नहीं बढ़ा रही”, उनके लिए अब खतरे की घंटी बज चुकी है।
तेल कंपनियों का ‘दर्द’ और जनता की ‘आह’
सूत्रों की मानें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार का हवाला देकर तेल कंपनियां पेट्रोल में 18 रुपये और डीजल में सीधे 35 रुपये की ऐतिहासिक बढ़ोतरी करने की तैयारी में हैं। सरकार अब तक चुनाव की वजह से इन कंपनियों को रोक कर बैठी थी, लेकिन अब ‘पिंजरा’ खुलने वाला है। सवाल यह है कि क्या तेल कंपनियों के घाटे का बोझ हमेशा आम आदमी की रसोई और वाहन पर ही डाला जाएगा?
परिभाषा बदल गई है!
सोशल मीडिया से लेकर चाय की थड़ियों तक अब एक ही चर्चा है— लोकतंत्र की नई परिभाषा। लोगों का कहना है कि आज का लोकतंत्र “लोगों की, लोगों से रूठी हुई और लोगों को लूटने के लिए बनी सरकार” जैसा महसूस होने लगा है। क्या लोकतंत्र में जनता का सरेआम लुटना ही अब नई परंपरा बन गई है?
सत्ता का ‘निर्दयी’ तमाशा?
यह देखना वाकई दिलचस्प और दर्दनाक होगा कि क्या सरकार सचमुच इतनी निर्दयी होकर जनता को महंगाई के कुएं में धकेल देगी। क्या सरकार का काम केवल चुनाव जीतना है, या चुनाव के बाद जनता के हितों की रक्षा करना भी? अगर ये कीमतें इसी तरह बढ़ीं, तो आम आदमी के लिए “अच्छे दिन” केवल चुनावी नारों की फाइलों में ही दबे रह जाएंगे।

