पवन माकन का सनसनीखेज सवाल – केजरीवाल को नेता चाहिए या ‘जी हुजूर’ करने वाले दरबारी?
विशेष संपादकीय रिपोर्ट
अहमदाबाद/नई दिल्ली:
आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली अब गंभीर विवादों के घेरे में है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि केजरीवाल को अब ऐसे नेता रास नहीं आ रहे हैं जो अपना दिमाग इस्तेमाल करते हों। ‘महानगर मेट्रो’ के ग्रुप एडिटर पवन माकन ने इस स्थिति का सटीक विश्लेषण करते हुए कहा है कि केजरीवाल के दरबार में अब केवल ‘खाली दिमाग’ वाले नेताओं का ही बोलबाला है।
मुख्य बिंदु:
- लोकतंत्र या तानाशाही?: अन्ना हजारे के आंदोलन की कोख से जन्मे केजरीवाल पर आज अपनी ही पार्टी में एकछत्र राज चलाने के आरोप लग रहे हैं। जो भी नेता सवाल पूछता है या असहमति जताता है, उसे बिना देरी किए बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
- बुद्धिजीवियों की व्यवस्थित विदाई: प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास जैसे कद्दावर और तर्कशील नेताओं को आखिर क्यों पार्टी छोड़नी पड़ी? पवन माकन का मानना है कि केजरीवाल उन लोगों से असुरक्षित महसूस करते हैं जो स्वतंत्र सोच रखते हैं और तर्कों के साथ बात करते हैं।
- ‘यस मैन’ संस्कृति का उदय: वर्तमान में आम आदमी पार्टी में केवल वे ही चेहरे आगे नजर आ रहे हैं जो बिना सवाल किए हुक्म का पालन करते हैं। “जी हुजूरी” ही अब AAP में टिके रहने और तरक्की करने का एकमात्र पैमाना बन गया है।
पवन माकन (ग्रुप एडिटर) का तीखा प्रहार:
“राजनीति में जब कोई नेता अपने इर्द-गिर्द ‘खाली दिमाग’ वाले लोगों की फौज खड़ी करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि आंतरिक लोकतंत्र खतरे में है। केजरीवाल को सवाल पूछने वाले नहीं, बल्कि सिर्फ ‘वाह-वाह’ करने वाले पसंद हैं। क्या इसी बदलाव के लिए जनता ने इन्हें चुना था? यह कैसी क्रांति है?”
जनता का सवाल?
क्या देश और विशेषकर गुजरात की जनता ऐसी ‘तानाशाही’ प्रवृत्तियों को स्वीकार करेगी? ‘महानगर मेट्रो’ हमेशा जनता के पक्ष में खड़ा होकर सत्ता के गलियारों से ये कड़वे सवाल पूछता रहेगा। केजरीवाल की राजनीति अब जनसेवा से भटक कर केवल ‘सत्ता की शतरंज’ बनकर रह गई है।
टीम महानगर मेट्रो

