विशेष रिपोर्ट: पवन माकन (ग्रुप एडिटर)
तिरुवनंतपुरम/इदुक्की: केरल की शांत वादियों में इस वक्त चुनावी सरगर्मी नहीं, बल्कि एक ‘धार्मिक और सामाजिक’ बवंडर उठा हुआ है। मुद्दा विकास या बेरोजगारी नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की बेटी के अंतरधार्मिक विवाह और पर्दे पर उतरी ‘द केरल स्टोरी-2’ है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, केरल की राजनीति ‘ध्रुवीकरण’ के नए केंद्र में तब्दील हो गई है।
5000 लड़कियों के धर्मांतरण का दावा: क्या है सच्चाई?
केरल की राजनीति में उस वक्त उबाल आ गया जब दक्षिणपंथी संगठनों और कुछ विपक्षी हलकों ने दावा किया कि राज्य में लगभग 5000 लड़कियों का योजनाबद्ध तरीके से धर्म परिवर्तन कराया गया है। इस दावों को हवा तब मिली जब मुख्यमंत्री की बेटी के एक मुस्लिम युवक के साथ विवाह को राजनीतिक मंचों पर ‘चुनावी मुद्दा’ बना दिया गया।
विपक्ष इसे राज्य की जनसांख्यिकी बदलने की साजिश बता रहा है, जबकि सत्ताधारी दल इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला करार दे रहा है।
राहुल गांधी का ‘इदुक्की’ प्रहार: “थिएटर खाली हैं, यही अच्छी खबर है”
6 मार्च, 2026 को इदुक्की के एक कॉलेज इवेंट में पहुंचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी। जब एक छात्र ने उनसे फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2’ के बारे में सवाल किया, तो राहुल का जवाब सीधा और तीखा था।
“यह जानकर खुशी होती है कि सिनेमा हॉल खाली पड़े हैं। लोग नफरत को नकार रहे हैं। फिल्म में जो दिखाया जा रहा है, वह असल केरल की तस्वीर नहीं है।”
राहुल गांधी (इदुक्की कॉलेज इवेंट में)
CPM का पलटवार: “मोनालिसा की कहानी ही असली केरल स्टोरी”
वामपंथी दल (CPM) ने फिल्म और धर्मांतरण के दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे ‘नफरत की राजनीति’ बताया है। पार्टी ने एक प्रतीकात्मक बयान जारी करते हुए कहा कि केरल की असली कहानी ‘मोनालिसा’ जैसी है—रहस्यमयी, सुंदर और सबको साथ लेकर चलने वाली, न कि वह जो फिल्मों में दिखाई जा रही है।
चुनावी मुद्दे और जनता का मिजाज
महानगर मेट्रो के विश्लेषण के अनुसार, केरल में इस बार मुख्य मुकाबले में तीन बड़े नैरेटिव टकरा रहे हैं:
- धार्मिक ध्रुवीकरण: धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ के दावों पर वोटबैंक की राजनीति।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता: CM की बेटी के विवाह को ढाल बनाकर व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा।
- सिनेमा बनाम हकीकत: फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2’ का राजनीतिक प्रभाव।
महानगर मेट्रो व्यू:
केरल जैसे साक्षर राज्य में जब धर्म और विवाह चुनावी मुद्दे बनते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए एक नया मोड़ होता है। राहुल गांधी का ‘खाली थिएटर’ वाला बयान और CPM का ‘मोनालिसा’ तर्क यह साफ करता है कि लड़ाई अब सड़कों से ज्यादा ‘परसेप्शन’ (नजरिए) की हो गई है।
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संपादन: पवन माकन (ग्रुप एडिटर)

