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मध्यम वर्ग का दर्द: “सैलरी हाथ में आने से पहले ही कहाँ गायब हो जाती है?”

देश के विकास की धुरी ‘सैंडविच क्लास’ टैक्स और महंगाई की दोहरी मार से बेहाल; राघव चड्ढा ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा

नई दिल्ली / अहमदाबाद

“मेरी आय मुझे मिलने से पहले ही कहाँ चली जाती है?” — यह सवाल आज भारत के करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों की जुबां पर है। हाल ही में राज्यसभा में सांसद राघव चड्ढा ने जब इस मुद्दे को उठाया, तो यह महज एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि देश के नौकरीपेशा वर्ग की कड़वी हकीकत बनकर उभरा। यह बहस सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, बल्कि मध्यम वर्ग पर बढ़ते उस असह्य आर्थिक बोझ की है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।

कॉर्पोरेट से ज्यादा व्यक्तिगत करदाताओं का योगदान!

हालिया आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में व्यक्तिगत करदाता (Individual Taxpayers) आयकर के रूप में लगभग ₹11 लाख करोड़ का योगदान दे रहे हैं, जबकि कॉर्पोरेट टैक्स की वसूली लगभग ₹9.8 लाख करोड़ होने का अनुमान है। यह तुलना साफ दिखाती है कि जिन कर्मचारियों की सैलरी से सीधा टैक्स (TDS) कटता है, उन पर वित्तीय बोझ बड़े उद्योग घरानों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है।

‘सैंडविच क्लास’ की दोहरी मुसीबत

मध्यम वर्ग आज एक ऐसी स्थिति में है जहाँ उसे ‘सैंडविच क्लास’ कहा जा रहा है:

  • सब्सिडी से वंचित: गरीब वर्ग की तरह इन्हें सरकारी सब्सिडी का लाभ नहीं मिलता।
  • बड़े प्रोत्साहन गायब: बड़े उद्योगपतियों की तरह इन्हें टैक्स में कोई भारी छूट या बड़े इंसेंटिव्स नहीं मिलते।

महंगाई की मार: आंकड़े दे रहे हैं गवाही
सीमित आय के बीच खर्चों में बेतहाशा बढ़ोतरी मध्यम वर्ग का बजट बिगाड़ रही है:

  • शिक्षा खर्च: सालाना 8% की बढ़ोतरी।
  • स्वास्थ्य सेवाएं: मेडिकल खर्च में करीब 9% का उछाल।
  • किराया और आवास: लगभग 7% की वृद्धि।
  • महंगाई (Inflation): लगातार 6-7% के आसपास रहने के कारण दैनिक उपभोग की वस्तुएं महंगी हो रही हैं।

क्या है मध्यम वर्ग की मांग?

आर्थिक विशेषज्ञों और करदाताओं की ओर से सरकार से टैक्स सिस्टम में संतुलन बनाने की मांग की जा रही है। प्रमुख सुझावों में मानक कटौती (Standard Deduction) को वर्तमान ₹50,000 से बढ़ाकर ₹75,000 या ₹1.5 लाख करने की बात कही गई है, ताकि मध्यम वर्ग के पास खर्च करने के लिए कुछ अतिरिक्त पैसे बच सकें।

निष्कर्ष

मध्यम वर्ग केवल टैक्स देने वाला एक समूह नहीं है, बल्कि वह देश की आर्थिक गतिशीलता का मुख्य आधार है। यदि इस वर्ग की वित्तीय स्थिरता डगमगाती है, तो बाजार में खपत (Consumption) घटेगी, जिसका सीधा असर देश की जीडीपी पर पड़ेगा। अब देखना यह है कि क्या आने वाले बजट में सरकार इस ‘सैंडविच क्लास’ को कोई बड़ी राहत देती है।

ब्यूरो रिपोर्ट: महानगर मेट्रो

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