‘फ्री दूध’ बंद होते ही गुजरात पुलिस का आतंक शुरू: सूरत और साणंद पुलिस की क्रूरता से जनता में भारी गुस्सा, सख्त कार्रवाई के दावों से अधिकारी शर्मिंदा
क्या गुजरात पुलिस आम जनता की सुरक्षा के लिए है या अपना आतंक फैलाने के लिए? यह सवाल आज राज्य का हर नागरिक पूछ रहा है। साणंद से सूरत और अहमदाबाद में पुलिस की क्रूरता और इंसानियत को पूरी तरह खत्म करने वाले थर्ड डिग्री टॉर्चर (कस्टोडियल टॉर्चर) के दो बेहद चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं। जब कानून के रखवाले ही रक्षक की जगह शिकारी बन जाएं, तो जनता न्याय के लिए कहां जाएगी? इन दोनों घटनाओं में ‘फ्री दूध’ यानी जबरन वसूली और फ्री खाने-पीने का असली चेहरा सामने आया है। सूरत में बदमाशी: सिर्फ़ चाय और नाश्ते के लिए 350 डंडे!
डायमंड सिटी सूरत से सबसे शर्मनाक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। सूरत पुलिस के कुछ गुंडागर्दी करने वाले कर्मचारियों ने एक छोटे
व्यापारी को सिर्फ़ इसलिए कस्टडी में ले लिया क्योंकि उसने पुलिसवालों को ‘मुफ़्त चाय और नाश्ता’ देने से मना कर दिया था! जैसे ही मुफ़्त दूध मिलना बंद हुआ, हैरान पुलिस ने अपनी पावर का गलत इस्तेमाल करके व्यापारी को हवालात में बंद कर दिया और उस पर बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। मिली जानकारी के मुताबिक, इस बेगुनाह व्यापारी को कस्टडी में एक-दो बार नहीं बल्कि 350 से ज़्यादा डंडों से पीट-पीटकर मार डाला गया। व्यापारी के शरीर पर चोट के निशान और चोटें देखकर कोई भी सेंसिटिव इंसान कांप जाएगा। क्या यही सूरत पुलिस की दोस्ती है?
साणंद में तालिबानी सज़ा: आरोपी को पेड़ से बांधकर पीटा!
दूसरी तरफ, अहमदाबाद रूरल के साणंद पुलिस स्टेशन से भी कानून को ठेंगा दिखाने वाला एक मामला सामने आया है। साणंद पुलिस ने कानूनी प्रोसेस को नज़रअंदाज़ करते हुए सीधे-सीधे तालिबानी तरीका अपनाया। एक आरोपी को पुलिस स्टेशन कंपाउंड में ही सरेआम रस्सी से पेड़ से बांध दिया गया और फिर पुलिसवालों ने उसे बेरहमी से लाठियों से पीटा। कानून के हिसाब से, यह तय करना कोर्ट का काम है कि कोई आरोपी क्रिमिनल है या नहीं, और अगर वह क्रिमिनल है भी, तो पुलिस को उसे इस तरह पीटने का हक किसने दिया? साणंद पुलिस की इस अमानवीय हरकत का वीडियो वायरल होते ही हर जगह इसकी चर्चा हो रही है।
‘महानगर मेट्रो ‘ का सवाल: सस्पेंड या जेल?
जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, तो सिस्टम सिर्फ ‘जांच के आदेश’ जारी करके या ‘पुलिसवालों को लाइन हाजिर’ करके या कुछ दिनों के लिए ‘सस्पेंड’ करके मामला निपटा देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून हाथ में लेने वाले इन खाकी वर्दी वाले गुंडों पर आम नागरिकों की तरह हाफ-मर्डर या क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी का चार्ज लगाकर जेल भेजा जाएगा? जब तक ऐसे ज़ालिम पुलिसवालों को सज़ा नहीं मिलती, तब तक जनता का खाकी से भरोसा उठता रहेगा। ‘पाको गुजरात न्यूज़’ इन पीड़ितों के साथ मजबूती से खड़ा है और जब तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक अपनी आवाज उठाता रहेगा।

