दूसरों के इशारों पर नाचने वाले कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकते। परिस्थिति चाहे कितनी भी विकट क्यों न हो, लेकिन अगर आपने अपना विवेक खो दिया, तो आप किसी न किसी की शतरंज के मोहरे बनकर रह जाएंगे।
क्या है ‘Snake Pit Effect’ (सांपों के गड्ढे का असर)?
कल्पना कीजिए कि एक गहरे अंधेरे गड्ढे में २० जहरीले सांप रहते हैं। ये सांप महीनों और सालों तक एक-दूसरे को काटे बिना, किसी भी झगड़े के बिना शांति से साथ रहते हैं। लेकिन, कहानी में मोड़ तब आता है जब कोई बाहरी व्यक्ति उस गड्ढे में सिर्फ एक मरा हुआ चूहा फेंक देता है।
उस गड्ढे में भोजन (संसाधन) सीमित है। नतीजा यह होता है कि जो सांप अब तक शांत थे, वे अचानक उस मरे हुए चूहे पर टूट पड़ते हैं। देखते ही देखते, वे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, आपस में लड़ते हैं और या तो घायल हो जाते हैं या एक-दूसरे को मार डालते हैं।
अब एक पल के लिए शांति से सोचिए… क्या वे सांप एक-दूसरे के असली दुश्मन थे? नहीं! उनका असली दुश्मन तो वह बाहर खड़ा इंसान था, जिसने अपने मनोरंजन या स्वार्थ के लिए अंदर चूहा फेंका और खेल की यह पूरी साजिश रची।
खेल (Sports) और संगठनों में इसका रूप
स्पोर्ट्स में या किसी भी संगठन में जब चयन प्रक्रिया (Selection Process) चल रही होती है, तब कई बार योग्य खिलाड़ियों या कर्मचारियों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होने के बजाय आपसी मनमुटाव पैदा कर दिया जाता है। प्रशासक या प्रबंधन कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं जहां योग्य लोग ही आपस में लड़ मरें। परिणाम यह होता है कि लोग सिस्टम की कमियों या भेदभाव के खिलाफ सवाल उठाना भूल जाते हैं और अपनी सारी ऊर्जा एक-दूसरे को नीचा दिखाने में बर्बाद कर देते हैं। असली विजेता सत्ता पर बैठी वह तीसरी शक्ति बनती है, जो इस विवाद का लाभ उठाकर अपना स्थान सुरक्षित रखती है।
कॉर्पोरेट जगत और कार्यस्थल का उदाहरण
एक ही ऑफिस या संस्था में साथ काम करने वाले दो होनहार साथी हैं। संस्था में प्रमोशन या इंसेंटिव जैसे संसाधन सीमित हैं। मैनेजर या कोई चतुर सहकर्मी दोनों के सामने एक-दूसरे की आधी-अधूरी बातें करके कान भरना शुरू कर देता है। नतीजतन, जो दो सक्षम लोग मिलकर संस्था को आगे ले जा सकते थे, वे एक-दूसरे के काम में रुकावटें पैदा करने लगते हैं। उनकी इस लड़ाई का असली फायदा वह चालाक मैनेजर उठाता है, जो दोनों को अपने नियंत्रण में रखता है।
परिवार और समाज पर असर
जब किसी परिवार में संपत्ति या पैसों की थोड़ी कमी होती है, तब बाहरी लोग आकर भाई-बहनों के बीच गलतफहमी का ‘जहर’ घोलना शुरू कर देते हैं। वे मूल समस्या (आर्थिक नियोजन) पर काम करने के बजाय एक-दूसरे के वजूद के दुश्मन बन जाते हैं। समाज में भी जब दो जातियों या धर्मों के लोगों को कोई अपने राजनीतिक या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए लड़ाता है, तब आम इंसान शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे असली मुद्दों को भूलकर आपस में लड़ मरता है।
इस जाल से बाहर कैसे आएं?
किसी की शतरंज का मोहरा बनने के बजाय एक जागरूक खिलाड़ी बनने के लिए इन बातों का विशेष ध्यान रखें:
तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें: जब भी किसी व्यक्ति के प्रति आपके मन में अचानक कड़वाहट आए, तो तुरंत रिएक्ट न करें। पहले यह देखें कि इस विवाद के पीछे कोई तीसरी शक्ति या स्वार्थ तो काम नहीं कर रहा है?
सिस्टम से सवाल करें, साथी से नहीं: यदि संसाधन कम हैं, तो आपस में लड़ने के बजाय इस बात के मूल कारण पर काम करें कि वे संसाधन क्यों कम पड़े।
संवाद ही सबसे श्रेष्ठ समाधान है: कैसी भी गलतफहमी हो, किसी तीसरे व्यक्ति की बात पर भरोसा करने के बजाय संबंधित व्यक्ति से सीधा संवाद स्थापित करें। सीधा संवाद आधे से ज्यादा साजिशों को नाकाम कर देता है।
जागरूक बनें, मोहरे नहीं!
याद रखें, आपका हर प्रतिद्वंद्वी (Competitor) आपका शत्रु नहीं है। कभी-कभी आप दोनों एक ही खेल के खिलाड़ी होते हैं और आपके बीच झगड़ा करवाकर असली मज़ा या फायदा कोई तीसरा ही ले जा रहा होता है।
जब आप दूसरों द्वारा फेंके गए ‘मरे हुए चूहे’ (झूठे लालच या अफवाहों) के पीछे भागना बंद कर देंगे, तब आप अपने आप सामने वाले की पूरी चाल को विफल कर देंगे। अपनी मानसिक शांति और विवेक की चाबी कभी किसी के हाथ में गिरवी न रखें।
“स्नेक पिट इफेक्ट” हमें सचेत करता है कि जब भी हमें किसी विवाद या लड़ाई में खींचने का प्रयास किया जाए, तब रुककर सोचना चाहिए—”इस लड़ाई में मेरा नुकसान करके पर्दे के पीछे से तालियां कौन बजा रहा है?” समझदार इंसान को ऐसे गड्ढे से हमेशा दूर रहना चाहिए।
दर्शना पटेल : (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर।

