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शेर एक जंगली जानवर है, लेकिन जिस तरह उसका स्वभाव भावनाओं से जुड़ा है : शेर का होना और समाज में उसकी पहचान

तखुभाई संसूर शेर एक जंगली जानवर है, लेकिन जिस तरह उसका स्वभाव भावनाओं से जुड़ा है, उसे जंगली या बेपरवाह नहीं माना जा सकता, वह ऐसा ही जानवर है। वह ज़्यादातर समाज में ही रहता है। अगर कोई किसी मनगढ़ंत डर से या उससे आने वाली बदबू की वजह से उससे नफ़रत करता है, तो अलग बात है, लेकिन अगर आप उसे राजा मानकर परेशान नहीं करते, तो उसे आपको परेशान करने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है!!? भगवान श्री कृष्ण ने गीता के विभूतियोग में कहा है कि मृगनाम् मृगनेन्द्रदहम्। मैं जानवरों में शेर हूँ।

हाल की घटनाओं ने एक बार फिर समाज में शेर के लिए दुश्मनी वाला माहौल बना दिया है। यह भी स्वाभाविक है कि जब किसी के परिवार का कोई सदस्य गुज़र जाता है, तो उसके प्रति नापसंदगी या दुश्मनी होना स्वाभाविक है! लेकिन हमें शेर के लिए कुछ बातें समझनी होंगी और उसके असर की भी चिंता करनी होगी!

शेर अब रेवेन्यू एरिया का रहने वाला बन गया है, यानी जहाँ हम खेती करते हैं। इनकी संख्या बढ़ने की वजह से आज ये गुजरात के करीब 11 जिलों और 35,000 स्क्वायर किलोमीटर में दिखते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि इंसानों के साथ इनका रिश्ता और गहरा हो गया है। लेकिन हमें इनसे डरने या इनसे जलने की ज़रूरत नहीं दिखती।

200 kg वज़न वाला यह विशालकाय जानवर हम सभी के लिए गर्व की बात है कि यह एशिया में सिर्फ़ एक ही जगह पर दिखता है। यही वजह है कि गिर और उसके आस-पास के इलाके टूरिज़्म इंडस्ट्री के तौर पर दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। इतना ही नहीं, हर साल कम से कम 35 लाख टूरिस्ट इस जानवर की तरफ़ खिंचे चले आते हैं। इससे 50 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है। लेकिन इसे हमारी विरासत की निशानी मानकर इसे बनाए रखना और सलाम करना भी एक ज़िम्मेदारी है!

समाज के सभी हिस्सों को इनकी सामाजिक स्वीकृति की चिंता करनी चाहिए। 2019 में मुझे अफ़्रीकी देश रवांडा जाने का मौका मिला। वहाँ मैंने एकेगारा नाम की एक सैंक्चुअरी देखी। वहां के लोकल लोगों ने बताया कि जब 1995 में रवांडा में नरसंहार हुआ था, तो अफ्रीकी शेरों की संख्या बहुत ज़्यादा थी। लेकिन उस नरसंहार के साथ ही वहां के लोकल आदिवासी लोगों का शेरों से कोई लगाव नहीं रहा। इसलिए उन्होंने 1995 में सभी शेरों को मार डाला। उस सैंक्चुअरी से शेर खत्म हो गए। फिर लोकल सरकार ने तंजानिया जैसे देशों से शेरों को लाकर उन्हें फिर से बसाने की कोशिश की। लेकिन उनके साथ सोशल इंटरेक्शन या कोऑर्डिनेशन की कमी के कारण शेरों को फिर से नहीं बसाया जा सका। जो भी शेर आए, वे फिर मर गए। यह उदाहरण दिखाता है कि अगर समाज इस जानवर को अपना नहीं मानेगा, तो ज़ाहिर है इसके होने पर सवाल उठेंगे!!

एक नागरिक के तौर पर सरकार की ज़िम्मेदारी जान-माल की सुरक्षा करना भी है, इसलिए सभी नागरिकों को अलर्ट करके, अगर कोई घटना होती है, तो जल्दी से मुआवज़ा देकर आग बुझाई जा सकती है। उसके लिए जनता का गुस्सा कम किया जा सकता है। समय-समय पर मुआवज़े की पॉलिसी को फिर से बनाना चाहिए, ज़रूरत पड़ने पर फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट को अलग-अलग कमेटियाँ बनानी चाहिए और शेर की पब्लिक एक्सेप्टेंस के लिए ज़रूरी प्रोग्राम ऑर्गनाइज़ करने चाहिए, तभी हम ज़रूर शेर के होने को मान पाएँगे और उसे लंबे समय तक बनाए रख पाएँगे। नहीं तो, उसके होने पर सवाल उठ रहे हैं!!!

-तखुभाई संसूर

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